संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल षष्ठी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: शोभन | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अक्टूबर 2026
यह लेख जांजगीर की चोर भट्टी स्थित डंगचघिन दाई की लोककथा और उससे जुड़ी आस्था को सामने रखता है। इसमें दारिका नटनी की समाधि से ग्रामदेवी बनने की परम्परा बासी भोग पूजा विधि और लोकमान्यताओं का वर्णन किया गया है।
यह लेख बीजानगरी स्थित हरसिद्धि देवी मन्दिर की मान्यताओं इतिहास और स्थापत्य को सामने रखता है। इसमें देवी की स्थापना नवरात्रि परम्पराओं अखण्ड ज्योत भक्तों की आस्था तथा परमारकालीन मन्दिर की भूमिज शैली और शिल्प का भी विस्तारपूर्वक वर्णन है।
यह लेख बैगा जनजाति के बच्चों के पारम्परिक खेलों और उनकी लोकसंस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है। डॉ. विजय चौरसिया ने गेंड़ी, कुकड़ा पाट और पुतरा पुतरी जैसे खेलों की विधियों, लोकगीतों तथा ग्रामीण जीवन से उनके सम्बन्ध का वर्णन किया है।
यह लेख सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी के प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटन इतिहास और प्रमुख दर्शनीय स्थलों का परिचय देता है। इसमें जलप्रपात गुफाएँ पर्वत वन्यजीव धार्मिक स्थल और औपनिवेशिक काल से जुड़ी धरोहरों के साथ पचमढ़ी की विशेषताओं का वर्णन है।
यह लेख तलवाड़ा के प्राचीन श्रीगणेश मन्दिर में उत्कीर्ण नृत्य गणपति प्रतिमाओं की कला परम्परा को सामने रखता है। इसमें गणेश के नटेश स्वरूप हस्त मुद्राओं नृत्य भंगिमाओं और मन्दिर की स्थापत्य विशेषताओं का परिचय विस्तार से दिया गया है।
यह लेख छत्तीसगढ़ के पारम्परिक खानपान और लोकजीवन के सम्बन्ध को सामने रखता है। इसमें बरा सोंहारी ठेठरी खुरमी फरा चीला चौसेला अइरसा जैसे व्यंजनों की विधि सामाजिक उपयोग और तीज त्योहारों से जुड़ी परम्पराओं का परिचय दिया गया है।
यह लेख माण्डू के इतिहास प्राकृतिक सौन्दर्य और स्थापत्य विरासत को सामने रखता है। इसमें जहाज महल रूपमती महल बाज बहादुर का महल होशंगशाह का मकबरा जामी मस्जिद और अन्य प्रमुख पर्यटन स्थलों का परिचय दिया गया है विस्तार से।
कोटा के प्राचीन खड़े गणेश जी मंदिर की आस्था, लोकमान्यताओं, स्वयंभू प्रतिमा, मनोकामना परंपराओं, जलभराव से जुड़ी लोकधारणा तथा नागर और मरु-गुर्जर प्रभावों वाली स्थापत्य विशेषताओं का परिचय देता आलेख मंदिर की सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत को रेखांकित करता है।
बघेरा के प्राचीन शूकर वराह मन्दिर की स्थापत्य, शिल्प और धार्मिक विशेषताओं पर केन्द्रित यह आलेख नागर शैली, विशाल वराह प्रतिमा, मूर्तिकला, अभिलेख, इतिहास तथा राजस्थान की समृद्ध मंदिर परंपरा और भारतीय सौन्दर्य-दृष्टि का परिचय प्रस्तुत करता है समग्र रूप।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का महत्त्व। भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट और गोवर्धन पर्वत के सन्दर्भ में प्रकृति के साथ तालमेल की आवश्यकता पर एक तथ्यपूर्ण लेख।
छिन्दवाड़ा के सतपुड़ा जंगलों में आयोजित होने वाली नागद्वारी यात्रा प्रकृति पूजा, आध्यात्मिक साधना और सामाजिक समरसता का संगम है। यह लेख नाग पंचमी के अवसर पर होने वाली इस दुर्गम यात्रा के महत्व और पर्यावरण संरक्षण के सन्देश को रेखांकित करता है।
हरेली छत्तीसगढ़ का प्रमुख कृषि पर्व है। यह त्योहार प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण और पशुधन के सम्मान से जुड़ा है। इस लेख में हरेली पर्व की परम्पराओं, मान्यताओं और ग्रामीण खेलों का विस्तृत विवरण दिया गया है।
आधुनिकता की दौड़ में जब आपसी सम्बन्ध कमजोर हो रहे हैं, ऐसे में इसका प्रभाव मित्रता पर भी पड़ा है। पहले मित्रता दो लोगों के साथ दो परिवारों के बीच भी होती थी। आज यह सम्बन्ध कमजोर हुआ है। ऐसे क्षेत्रों जहां पश्चिमी जगत प्रभाव कम है, वहाँ के गांवों ने हमारी भारतीय संस्कृति…
रामगढ़ पहुंचे मुख्यमंत्री साय ने सीताबेंगरा और जोगीमारा गुफाओं का किया अवलोकन। जानिए उन्होंने क्यों कहा कि हमारी सांस्कृतिक धरोहरें आने वाली पीढ़ियों के लिए हैं अमूल्य विरासत।
यह लेख राष्ट्रीय सीमाओं, पासपोर्ट-वीज़ा व्यवस्था, संकीर्ण राष्ट्रवाद और वैश्विकता के बीच फँसी मानवीय संवेदनाओं का गहन विश्लेषण करता है। लेखक बताता है कि तकनीक ने दुनिया को वैश्विक ग्राम तो बना दिया है, पर मानवता आज भी सीमाओं, भय, पहचान और कट्टरपन्थ की बेड़ियों में जकड़ी हुई है। लेख…
यह लेख डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ के इतिहास, लोककथाओं, नामकरण, शैलचित्रों, रियासतों और सांस्कृतिक चेतना का विवेचन करता है। इसमें जनश्रुतियों और ऐतिहासिक सन्दर्भों के आधार पर छत्तीसगढ़ की गौरवपूर्ण परम्परा को समझने का प्रयास किया गया है।
मेवाड़ की गवरी परम्परा में सींग वाले सिंह के रूप में नरसिंह की आदिम लोक-कल्पना दिखाई देती है। यह लेख लोकनाट्य, जनजातीय आस्था और प्राचीन प्रतीक-चेतना के माध्यम से नरसिंह स्वरूप की सांस्कृतिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।
यह लेख रामचरितमानस में वर्णित रामराज्य के पर्यावरणीय दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। इसमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्यजीवों की निर्भयता, प्रकृति और मानव के सामंजस्य तथा वर्तमान जलवायु संकट के संदर्भ में वैदिक मूल्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है।
यह लेख छिन्दवाड़ा के गौरवशाली इतिहास, देवगढ़ के गोण्ड राजवंश, उनके स्थापत्य कौशल, जल प्रबन्धन, धार्मिक-सांस्कृतिक समरसता और जननायक बादल भोई के बलिदान को ऐतिहासिक दृष्टि से प्रस्तुत करता है।
रमेश शर्मा जी का यह लेख अधिकमास अथवा पुरुषोत्तम मास के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आधारों को स्पष्ट करता है। इसमें सूर्य और चंद्रमा की गति के अंतर से अधिकमास के निर्धारण, पुरुषोत्तम मास के धार्मिक महत्व, आरोग्य, आत्मशक्ति जागरण और समाज में सकारात्मक ऊर्जा के संदेश का संतुलित विवेचन…
कांचीपुरम का कैलाशनाथर मन्दिर केवल भगवान शिव की उपासना का पवित्र केन्द्र नहीं, अपितु प्राचीन भारत की ज्ञान परम्परा का भी महान प्रतीक है। पल्लव काल में यह मन्दिर शिक्षा, साधना और संस्कृति का ऐसा केन्द्र बना जहाँ देशभर से विद्यार्थी आकर तर्कशास्त्र, राजनीति, चिकित्सा, व्याकरण और वेद-वेदांगों का अध्ययन…
क्या कोई जलधारा सहस्राब्दियों तक पूर्णतः शुद्ध रह सकती है? देवलोक से पृथ्वी पर उतरी पतितपाविनी गंगा के इसी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य को समझने के लिए इस विशेष लेख को अवश्य पढ़ें!
यह शोधपरक लेख असम में रामकथा की समृद्ध परम्परा और उसके स्थानीय स्वरूपों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। माधव कन्दली, श्रीमन्त शंकरदेव और माधवदेव जैसे संतों एवं कवियों द्वारा रामायण को असमिया लोकजीवन के अनुरूप ढालकर जन-जन तक पहुँचाने की प्रक्रिया का अत्यन्त सारगर्भित विवेचन किया गया है।
बैगा जनजातीय समुदाय में जंवारा नवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान है, जो गांव की सुरक्षा, समृद्धि और देवी आराधना से जुड़ा है। इसमें जवारा बोने, जोत जलाने, जसगीत गाने और सामूहिक अनुष्ठानों के माध्यम से देवी शक्ति की उपासना की जाती है। अंत…
असम के धुबरी जिले के अशारीकांडी गांव की 'हीरामती' मिट्टी से बनी टेराकोटा कला सदियों पुरानी है। 77वें गणतंत्र दिवस परेड में इस अनूठी शिल्पकला को राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली। यह कला भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रमाण है।
पीथमपुर (जांजगीर-चांपा, छ.ग.) में हसदेव नदी तट पर स्थित काल कालेश्वरनाथ मंदिर में फाल्गुन पूर्णिमा से 15 दिवसीय भव्य मेला लगता है। धूल पंचमी पर निकलने वाली शिव बारात और नागा साधुओं की उपस्थिति इसे अविस्मरणीय बनाती है।
अजयमेरु की अजेय पर्वतीय अस्मिता, चौहान-कालीन स्थापत्य की गौरवगाथा, मुगलकालीन परकोटों की सामरिक संरचना तथा राजवंशीय हवेलियों का वैभव—इन सबका समन्वित इतिहास अजमेर की दीर्घ सांस्कृतिक चेतना का दर्पण है। इसके द्वारों और कोठियों में निहित विरासत को जानने हेतु पूर्ण आलेख अवश्य पढ़ें।
अमरकंटक, मैकल पर्वत पर स्थित माँ नर्मदा का पवित्र उद्गम स्थल है। जानिए अमरकंटक की पौराणिक कथाएँ, शिवलिंग, मंदिर और ऐतिहासिक महत्व।
कमलक्षेत्र, देवपुर और पद्मावतीपुरी के नाम से प्रसिद्ध राजिम, महानदी त्रिवेणी संगम का वह तीर्थ है जहाँ वैष्णव, शैव और साक्त परंपराएँ एक साथ सांस लेती हैं। भक्तिन राजिम की तपस्या से राजिम लोचन की प्रतिष्ठा और नगर-नामकरण की कथा जानिए।
कोणार्क का सूर्य मंदिर प्राचीन भारतीय स्थापत्य, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक दर्शन का अद्वितीय उदाहरण है। रथनुमा संरचना, प्रतीकात्मक पहिए और सूर्य उपासना से जुड़ी यह विश्व धरोहर भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक ऊँचाई को दर्शाती है।