संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल षष्ठी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: शोभन | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अक्टूबर 2026
यह लेख मालवा के रायकुंडा गाँव में स्थित प्राचीन महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा और जनजातीय लोकआस्था के सम्बन्ध को सामने रखता है। इसमें शीतला माता की पूजा पुरातात्विक अवशेष भील परम्परा नवरात्रि अनुष्ठान तथा संरक्षण की आवश्यकता का परिचय दिया गया है।
यह लेख बस्तर और छत्तीसगढ़ की सप्तमातृका परम्परा को लोकगीतों और मूर्तिशिल्प के माध्यम से प्रस्तुत करता है। इसमें ब्राह्मणी वैष्णवी माहेश्वरी इन्द्राणी कौमारी वाराही और चामुण्डा के स्वरूप आयुध वाहन तथा नवरात्रि की लोकआस्था का परिचय दिया गया है।
यह लेख भारतीय परम्परा में शक्ति उपासना के स्वरूप और उसके शिल्पगत विकास को सामने रखता है। इसमें नवदुर्गा द्वादश गौरी मातृदेवी महिषमर्दिनी शिव शक्ति समन्वय और विभिन्न मन्दिरों में प्राप्त देवी प्रतिमाओं का परिचय दिया गया है।
यह लेख श्राद्ध पक्ष में पितरों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य की परम्परा को सामने रखता है। इसमें पिण्डदान तर्पण तीर्थ श्राद्ध श्रीमद्भागवत पाठ और पुत्र द्वारा किए जाने वाले कर्मों से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का वर्णन किया गया है।
यह लेख पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और स्मृति के पर्व के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें तर्पण श्राद्ध पिंडदान पंचबलि दीपदान पारिवारिक स्मृतियों और बदलते शहरी जीवन के बीच परम्परा को बचाए रखने की आवश्यकता समझाई है।
यह लेख भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समरसता के विचार को वेद उपनिषद और रामकथा के उदाहरणों से समझाता है। इसमें एकता सहयोग करुणा प्रकृति प्रेम शबरी प्रसंग और सामाजिक न्याय के माध्यम से समरस जीवन की आवश्यकता बताई गई है।
यह लेख बैगा जनजाति के बच्चों के पारम्परिक खेलों और उनकी लोकसंस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है। डॉ. विजय चौरसिया ने गेंड़ी, कुकड़ा पाट और पुतरा पुतरी जैसे खेलों की विधियों, लोकगीतों तथा ग्रामीण जीवन से उनके सम्बन्ध का वर्णन किया है।
यह लेख भारतीय संस्कृति में सौम्यता समंजन और संयम को नेतृत्व तथा सामाजिक स्वीकृति से जोड़कर देखता है। राम बुद्ध अशोक और गांधी जैसे उदाहरणों से अतिवाद की सीमाएँ तथा संतुलित सहनशील और सकारात्मक आचरण का महत्त्व समझाया गया है।
यह लेख लोकजीवन में सामाजिक समरसता के संस्कारों और व्यवहारिक रूपों को सामने रखता है। इसमें जन्म विवाह लोकपरम्पराओं सहकारिता समानता पर्यावरण कुटुम्ब प्रबोधन और पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज में बंधुत्व तथा एकता की आवश्यकता समझाई गई है।
यह लेख महात्मा गांधी को भारत की लोकचेतना और जन-जन से जुड़े विचारक के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें सत्याग्रह, स्वदेशी, चरखा, ग्राम स्वराज, लोकगीत और सर्वजन मंगल के माध्यम से उनके जीवन दर्शन को विस्तारपूर्वक समझाया गया है।
यह लेख भारतीय परम्परा में दान के वास्तविक अर्थ को समझाता है। इसमें दान चढ़ावा और समर्पण के बीच अन्तर के साथ शास्त्रों में वर्णित सात्त्विक दान गोपनीयता पात्रता नीयत और लोककल्याण की भावना का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है।
यह लेख सनातन दर्शन में मृत्यु पुनर्जन्म और तीन शरीरों की अवधारणा को समझाता है। इसमें स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर के साथ श्राद्ध तर्पण पितृयज्ञ तथा पूर्वजों के प्रति श्रद्धा से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का वर्णन किया गया है।
यह लेख पंडित मेदिनी प्रसाद पाण्डेय के साहित्यिक जीवन और रायगढ़ से उनके सम्बन्ध को सामने रखता है। इसमें उनकी काव्य साधना गणपति उत्सव दर्पण छत्तीसगढ़ प्रेम और राजा भूपदेव सिंह के संरक्षण में विकसित साहित्यिक यात्रा का वर्णन है।
यह लेख कर्मा पर्व की जनजातीय परंपरा और प्रकृति से उसके गहरे सम्बन्ध को सामने रखता है। इसमें करम देवता की पूजा कर्म सिद्धान्त कृषि जीवन कर्मा नृत्य लोकगीत सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पक्ष विस्तार से समझाए हैं।
यह लेख कोटा में डोल ग्यारस की ऐतिहासिक परम्परा को सामने रखता है। इसमें मथुराधीश जी की स्थापना देव विमानों की शोभायात्रा चम्बल में जलविहार और पुष्टिमार्ग की हवेली संगीत परम्परा के विकास का विस्तार से वर्णन किया गया है।
यह लेख भगवान गणेश के वैदिक और पौराणिक स्वरूप को सामने रखता है। इसमें गणेश पूजा परम्परा ओंकार स्वरूप बारह नाम उत्पत्ति कथाओं विभिन्न युगों के रूपों और गणेश उत्सव की धार्मिक मान्यताओं का परिचय दिया गया है विस्तार से।
यह लेख भगवान विश्वकर्मा के वैदिक और पौराणिक स्वरूप को सामने रखता है। इसमें उनके शिल्प ज्ञान वास्तुकला निर्माणों कर्म की महत्ता और विश्वकर्मा जयंती की परंपरा का उल्लेख है। साथ शास्त्रीय सन्दर्भों और पूजा विधि को समझाया गया है।
यह लेख ऋषि पंचमी के माध्यम से सप्तऋषियों की ज्ञान परंपरा और भारतीय जीवन मूल्यों को सामने रखता है। इसमें आश्रम व्यवस्था और प्रकृति के प्रति संवेदना का उल्लेख है। लोकज्ञान और पीढ़ी तक संस्कार पहुँचाने की आवश्यकता समझाता है।
छत्तीसगढ़ी तीजा पर्व की आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, सामाजिक और पर्यावरणीय महत्ता को रेखांकित करता यह आलेख हरतालिका व्रत, करुभात, निर्जला उपास, मइके-ससुराल संबंध, लुगरा-सम्मान, प्रकृति-संरक्षण तथा नारी स्वाभिमान से जुड़ी लोकपरंपराओं का संवेदनशील और समग्र परिचय प्रस्तुत करता है सहज रूप।
पोला और कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर केन्द्रित यह आलेख छत्तीसगढ़ की कृषि-संस्कृति, बैलों के प्रति कृतज्ञता, मिट्टी के लोकशिल्प, कृषि उपकरणों के सम्मान, कुश की धार्मिक महत्ता और प्रकृति-संरक्षण के भारतीय जीवन-मूल्यों को समग्र और सार्थक रूप से रेखांकित करता है।
छत्तीसगढ़ का पोरा पर्व कृषि, नंदी बैल, मिट्टी के खिलौनों, पारंपरिक पकवानों, गरभचरु विधान और तीजा से जुड़ी लोकपरंपराओं का उत्सव है। यह आलेख ग्रामीण आस्था, धान की फसल, बैगा परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को रेखांकित करता है।
भारतीय संस्कृति और धर्म ग्रन्थों में गोवंश के महत्त्व पर विस्तृत लेख। गोवत्स द्वादशी की कथा, कृषि अर्थव्यवस्था में बैलों का योगदान और आधुनिक युग में गोवंश संरक्षण की आवश्यकता को विस्तार से पढ़ें।
राजस्थान के ग्रामीण अंचल में मनाया जाने वाला गाँव बारणे लोकोत्सव ग्राम देवताओं, पशुधन, फसलों और प्रकृति की सुरक्षा से जुड़ी सामुदायिक परंपरा है। पूजा, ग्राम-सीमा शुद्धिकरण, दाल-बाटी-चूरमा सहभोज और सामूहिक सहभागिता इसके प्रमुख सांस्कृतिक आयाम हैं और सामाजिक एकता।
इस लेख में प्रो. अश्विनी केशरवानी ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकनाट्य, रामलीला और रासलीला परंपरा का वर्णन किया है। इसमें शिवरीनारायण और नरियरा (छत्तीसगढ़ का वृंदावन) की विख्यात नाटक मंडलियों के योगदान को रेखांकित किया गया है। साथ ही, अंचल में प्रचलित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव, 'आठे कन्हैया', दहिकांदो और रायगढ़…
इस लेख में डॉ. नेहा प्रधान ने कोटा की विशिष्ट 'चित्रपूजा' और कृष्णभक्ति परंपरा का वर्णन किया है। वल्लभ संप्रदाय की प्रथम पीठ 'मथुराधीश मंदिर' के प्रभाव से कोटा की चित्रकला केवल कला न रहकर आराधना का माध्यम बन गई। चित्रों को भगवान स्वरूप ('चित्र जी') मानकर पूजने की इस…
ऋग्वेद में विष्णु विश्व के ‘गोपा’ अर्थात् रक्षक हैं, जबकि ब्रज में वही तत्त्व गोपालकृष्ण के प्रेममय रूप में प्रकट होता है। यह लेख वैदिक विराटता से भागवत के सख्य, वात्सल्य और माधुर्य तक की यात्रा को समझता है।
छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक पर्व हलषष्ठी (खमरछठ) की सम्पूर्ण जानकारी। लेख में सन्तान की रक्षा के लिए माताओं द्वारा किए जाने वाले इस व्रत की विधि, सामग्री और पौराणिक कथा का विस्तृत वर्णन पढ़ें।
प्रस्तुत लेख भारतीय लोक जीवन में वाचिक परम्परा और श्रुति ज्ञान के ऐतिहासिक महत्त्व को उजागर करता है। इसमें लोक शिक्षा, वनांचली समुदायों के जीवन दर्शन और पीढ़ियों तक ज्ञान सौंपने की मौखिक शैली का तथ्यात्मक और गम्भीर विश्लेषण किया गया है।
कजली तीज भारतीय नारी, दाम्पत्य, प्रकृति और लोक आस्था का समन्वित पर्व है। नीमडी माता की पूजा, चन्द्र अर्घ्य, लोकगीत, व्रत और पर्यावरण चेतना के माध्यम से यह परंपरा सांस्कृतिक निरंतरता और प्रकृति संरक्षण का संदेश देती है।