संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल षष्ठी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: शोभन | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अक्टूबर 2026
यह लेख भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समरसता के विचार को वेद उपनिषद और रामकथा के उदाहरणों से समझाता है। इसमें एकता सहयोग करुणा प्रकृति प्रेम शबरी प्रसंग और सामाजिक न्याय के माध्यम से समरस जीवन की आवश्यकता बताई गई है।
यह लेख बैगा जनजाति के बच्चों के पारम्परिक खेलों और उनकी लोकसंस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है। डॉ. विजय चौरसिया ने गेंड़ी, कुकड़ा पाट और पुतरा पुतरी जैसे खेलों की विधियों, लोकगीतों तथा ग्रामीण जीवन से उनके सम्बन्ध का वर्णन किया है।
यह लेख भारतीय संस्कृति में सौम्यता समंजन और संयम को नेतृत्व तथा सामाजिक स्वीकृति से जोड़कर देखता है। राम बुद्ध अशोक और गांधी जैसे उदाहरणों से अतिवाद की सीमाएँ तथा संतुलित सहनशील और सकारात्मक आचरण का महत्त्व समझाया गया है।
यह लेख लोकजीवन में सामाजिक समरसता के संस्कारों और व्यवहारिक रूपों को सामने रखता है। इसमें जन्म विवाह लोकपरम्पराओं सहकारिता समानता पर्यावरण कुटुम्ब प्रबोधन और पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज में बंधुत्व तथा एकता की आवश्यकता समझाई गई है।
बैगा जनजाति की शिकार परंपराएँ उनके प्रकृति-आधारित जीवन, कौशल और वैज्ञानिक समझ का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। इस लेख में धनुष-बाण से लेकर विविध प्रकार के फंदों तथा मछली पकड़ने की पारंपरिक विधियों का विस्तृत वर्णन किया गया है, जो उनकी सामूहिक जीवनशैली और पर्यावरणीय ज्ञान को दर्शाता है…
यह लेख भारतीय समाज की उस मूल संरचना को स्पष्ट करता है, जिसकी आधारशिला संस्कारों पर टिकी हुई है। इसमें बताया गया है कि संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण, विचार और सामाजिक उत्तरदायित्व को दिशा देने वाली एक समग्र जीवन-पद्धति हैं। परिवार, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक…
यह शोधपरक लेख असम में रामकथा की समृद्ध परम्परा और उसके स्थानीय स्वरूपों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। माधव कन्दली, श्रीमन्त शंकरदेव और माधवदेव जैसे संतों एवं कवियों द्वारा रामायण को असमिया लोकजीवन के अनुरूप ढालकर जन-जन तक पहुँचाने की प्रक्रिया का अत्यन्त सारगर्भित विवेचन किया गया है।
यह लेख राजस्थान की घुमन्तू रैबारी समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं का वर्णन करता है। जन्म, विवाह और मृत्यु संस्कारों से जुड़े अनोखे रीति-रिवाज, देवी-देवताओं में अटूट आस्था और सामूहिक जीवनशैली इस समुदाय की पहचान हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परम्परा से चली आ रही हैं। इस अनमोल संस्कृति को करीब…
छत्तीसगढ़ के घने वनों में बसी बैगा जनजाति का औषधीय ज्ञान आधुनिक चिकित्सा से सदियों पहले विकसित हुआ एक जीवंत विज्ञान है। जड़ी-बूटियों, प्रकृति के साथ तादात्म्य और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिले अनुभवों पर आधारित यह परंपरा आज भी इस समुदाय के लिए जीवनरक्षा का सशक्त माध्यम है।
बैगा जनजाति की गोदना परम्परा केवल शृंगार नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और जीवन-दर्शन है। आधुनिकता के दबाव में यह अमूल्य धरोहर विलुप्ति के कगार पर है। बैगा चक क्षेत्र की इस सांस्कृतिक विरासत, मान्यताओं और विधियों को समझने के लिए यह आलेख अवश्य पढ़ें।
माता भूमि की संतति होकर मानव ने वन से नगर तक की यात्रा की, पर अपनी मूल प्रकृति नहीं छोड़ी। यह आलेख बताता है कि आज का विश्व प्राचीन वनवासियों की प्रकृति-आधारित जीवनशैली का ऋणी है, और क्यों भारतीय संस्कृति आज भी जीवित सभ्यता है। पढ़ने हेतु लिंक देखें।
यह आलेख छत्तीसगढ़ी फाग गीतों की परंपरा, स्वरूप और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालता है। इसमें ऋतुचक्र, फसलचक्र और वसंतोत्सव के साथ जुड़े फाग गीतों की सामाजिक-धार्मिक अभिव्यक्ति का विवेचन है। राधा-कृष्ण की लीलाएँ, रामकथा प्रसंग, आल्हा गायन और देवर-भाभी संवाद तक, फाग गीत ग्रामीण लोकजीवन, भक्ति और उत्सवधर्मी संस्कृति…
भारतीयता केवल भाषा या वेष-भूषा से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों, सहिष्णुता और आध्यात्मिक परंपराओं से पहचानी जाती है। सत्य, धर्म और विविधता के सम्मान पर आधारित यह संस्कृति जगत को एकात्मता और मर्यादा का संदेश देती है।
यह आलेख छत्तीसगढ़ की वाचिक परंपराओं में हाना (मुहावरे/लोकोक्तियों) की महत्ता को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि कैसे हाना लोकजीवन के अनुभवों, प्रकृति, इतिहास, धर्म, समाज और पारिवारिक जीवन से जन्म लेकर छत्तीसगढ़ की संस्कृति का दर्पण बनते हैं। कम शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता, हास्य…
यह आलेख भारतीय संस्कृति की समृद्ध यात्रा, उसकी कलात्मक, दार्शनिक और सामाजिक विशेषताओं का व्यापक वर्णन करता है। इसमें प्राचीन भारत की मूर्तिकला, चित्रकला, नाट्यकला, नृत्यकला, शिक्षा, दर्शन और जीवन मूल्यों से लेकर वर्तमान समय में संस्कृति पर पड़ते पाश्चात्य प्रभाव तक की चर्चा की गई है। आलेख यह भी…
यह आलेख सामाजिक संरचना में संस्कृति की केंद्रीय भूमिका, नैतिक मूल्यों के क्षरण, और औद्योगीकरण व पाश्चात्य प्रभाव के चलते बदलते सामाजिक संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। लेख बताता है कि कैसे आधुनिकता के आकर्षण में हमारी सांस्कृतिक विरासत, लोककलाएँ, और पारंपरिक जीवन मूल्य धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं…
यह आलेख समाज और संस्कृति के गहरे संबंधों पर प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि संस्कृति समाज का नैतिक और आदर्श रूप होती है, जो व्यक्ति के आचरण, विचार और जीवन-मूल्यों से निर्मित होती है। औद्योगीकरण, पाश्चात्य प्रभाव और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के चलते भारतीय समाज में पारंपरिक मूल्य…
यह आलेख भारतीय लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों की पृष्ठभूमि में सार्वजनिक पुस्तकालयों की भूमिका पर प्रकाश डालता है। भारत की प्राचीन संस्कृति और आधुनिक शिक्षा के सेतु के रूप में पुस्तकालय एक सांस्कृतिक केंद्र बनते हैं। राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान जैसी संस्थाएं देशभर में पठन-पाठन संस्कृति के प्रचार-प्रसार और…
यह आलेख इक्कीसवीं सदी में संस्कृति के स्वरूप और उसके परिवर्तनशील आयामों की पड़ताल करता है। आधुनिक तकनीकी, संचार क्रांति और सामाजिक उथल-पुथल के बीच यह संस्कृति के स्थायित्व, पुनर्प्रतिष्ठा और आत्मिक वापसी की संभावना को रेखांकित करता है। आलेख इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि यद्यपि जीवनशैली में तीव्र…
भोजन न केवल शरीर का पोषण करता है बल्कि मनुष्य के स्वास्थ्य, चेतना और जीवनशैली को भी प्रभावित करता है। प्राचीन वेदों और परंपराओं में ऋतु के अनुसार भोजन, पथ्य-कुपथ्य का विचार और अन्न के वैज्ञानिक भंडारण की परंपरा रही है। आज बदलती कृषि तकनीक, अनियमित खानपान और अस्वास्थ्यकर तेलों…
यह लेख लोक साहित्य और लोक संस्कृति की उस जीवन्त परंपरा को उजागर करता है, जो भारतीय जनमानस की आत्मा, संवेदनाओं और संस्कारों का प्रतिबिंब है। इसमें लोकगीतों, कथाओं, गाथाओं, रीति-रिवाजों, त्योहारों और जन-विश्वासों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के गहरे अर्थ, सामाजिक मूल्य, और जीवन-दर्शन को रेखांकित किया गया…
नील नदी की गोद में बसे मिश्र और भारत के प्राचीन व्यापार, संस्कृति व आध्यात्मिक संबंधों की रोचक झलक।
यह लेख भारत की प्राचीन और उन्नत खेती की परंपरा का प्रमाण प्रस्तुत करता है। मेहरगढ़ से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र और वराहमिहिर की भविष्यवाणियों तक, यह लेख बताता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में हजारों वर्ष पूर्व वैज्ञानिक पद्धति से खेती होती थी। भारत ही वह भूमि है, जहां मानव…
योग आत्मा और परमात्मा के मिलन की प्रक्रिया है, जो चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित करता है। यह केवल व्यायाम नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवनशैली और आत्मिक उन्नति का मार्ग है। मानव कल्याण हेतु योग एक वैज्ञानिक, सार्वभौमिक और व्यवहारिक साधना है। 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मानवता को भारत…
खड़िया जाति भारत मे सर्वाधिक उड़ीसा, झारखंड के बाद छत्तीसगढ़ में पाई जाती है। जनगणना के अनुसार छतीसगढ़ में खड़िया 49032 है, जिसमें रायगढ़, फरसाबहार, जशपुर के बाद महासमुन्द जिले में इनकी आबादी अधिक है। बागबाहरा के जंगल क्षेत्र व बसना विकास खण्ड में भी इनकी बसाहट है।
बस्तर सम्भाग में आदिवासियों की विभिन्न प्रकार की प्रजातियाँ निवास करती हैं जिनमें मुरिया, माड़िया, अबूझमाड़िया, दंडामी माड़िया, परजा, धुरवा इसी तरह गदबा, मुंडा, हल्बा और भतरा आदि प्रमुख जनजातियाँ प्रमुख हैं। इन जनजातियों की बोली-भाषा, रहन-सहन आदि में काफी समानता है। इन्हें केवल अध्ययन की दृष्टि से अलग किया…
पूरी दुनिया में श्री राम मंदिर के निर्माण को लेकर जबरजस्त उत्साह देखा जा रहा है। देश में भगवान श्री राम से जुड़ी कई कथाओं की चर्चा हो रही है लोग अपने अपने ढंग से भगवान श्री राम को अपने से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं यहां तक कि…
सौंदर्य के प्रति मानव प्राचीन काल से ही सजग रहा है, देह के अलंकरण में उसने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी एवं नख सिख से लेकर गुह्यांग तक अलंकरण करने के लिए नवोन्मेष किए। सौंदर्य वृद्धि के लिए किए गए भिन्न भिन्न अलंकरण हमें तत्कालीन प्रतिमा शिल्प में दिखाई देते…
धरती के किसी भी प्राणी को जीवन संचालन के लिए उर्जा की आवश्यकता होती है एवं प्राण संचालन की उर्जा भोजन से प्राप्त होती है। मनुष्य भी चौरासी लाख योनियों में एक विवेकशील प्राणी माना गया है, इसे भी उर्जा के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। अन्य सभी प्राणियों…
युञ्ज्यते असौ योग:, योग शब्द संस्कृत के युञ्ज धातु से बना है। जिसका अर्थ है जुड़ना, मिलना या एकजुट होना। योग, विश्व को प्राचीन भारतीय परंपरा एवं संस्कृति की अनुपम देन है। योग द्वारा मनुष्य अपने शरीर एवं मन-मस्तिष्क को आत्मबल प्रदान कर प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाता है…