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पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अक्टूबर 2026

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दान का दर्शन: आत्म-शुद्धि और सांस्कृतिक निरंतरता का मार्ग

दान का दर्शन: आत्म-शुद्धि और सांस्कृतिक निरंतरता का मार्ग


दान का मूल्य उसकी राशि से नहीं, उसकी नीयत से तय होता है। इसलिए शास्त्र दान को गोपनीय रखने की सलाह देते हैं, जबकि आज अक्सर उसकी गिनती और घोषणा अधिक दिखाई देती है। भारतीय परंपरा में ‘दान’, ‘चढ़ावा’ और ‘समर्पण’ तीन अलग भाव हैं- चढ़ावा देवता से संवाद, दान समाज से संवाद और समर्पण स्वयं से संवाद। आइए देखें, शास्त्र, साहित्य और लोक परंपरा इनकी क्या व्याख्या करते हैं।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति सुविचारित है, सुपरीभाषित है और इसमें अध्यात्म का समन्वय है। यही वजह है कि यह शाश्वत भी है और प्रवाही भी। ‘दान’ को इसमें जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। लोक जीवन में हम अक्सर तीन शब्दों- ‘दान’, ‘अर्पण’ या ‘चढ़ावा’ और ‘समर्पण’ को धर्म और अध्यात्म से जोड़कर देखते हैं। समानार्थक होते हुए भी इन तीनों शब्दों के अलग-अलग अर्थ हैं, जो अलग-अलग प्रयोजन के लिए उपयोग में आते हैं। ऐसे में इनका जरा-सा गलत उपयोग अर्थ को अनर्थ में बदल देता है। वास्तव में, इन तीनों शब्दों की अपनी विशेषता, मान और उद्देश्य है। ‘चढ़ावा’ या ‘अर्पण’ का भाव होता है अनुष्ठान या कामना की पूर्ति। पूजा या अनुष्ठान के पूरा होने के बाद भौतिक वस्तुएं- धन, भोग आदि का अर्पण होता है। वहीं, ‘समर्पण’ का भाव अहंकार का त्याग और संपूर्ण विलय होता है। मसलन, मोक्ष या परमात्मा से एकाकार, जिसमें संपूर्ण जीवन का समर्पण। ‘दान’ का भाव है परोपकार, दया और इसका उद्देश्य होता है लोक कल्याण। ‘दान’ में धन, भोजन, वस्त्र, ज्ञान एवं सामग्रियों का निश्चल और निःस्वार्थ पेशकश होती है।

आस्था, दान और अर्पण
आस्था, दान और अर्पण

लोक की वाणी, शास्त्र की वाणी
भारतीय संस्कृति में ‘दान’ की परंपरा अत्यंत प्राचीन, गौरवशाली और धर्म-संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य, श्रीमद्भगवद्गीता आदि शास्त्रीय ग्रंथों में ‘दान’ को मानव जीवन का अनिवार्य धर्म और पुरुषार्थ माना गया है। इसी तरह साहित्य, लोक साहित्य में भी ‘दान’ की गरिमा गंभीरता से बयां की गई है। तुलसी, कबीर, रहीम, सूर से लेकर तुकाराम आदि ने ‘दान’ की उपयोगिता को रेखांकित किया है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-

प्रकट चारि पद धर्म के कलियुग महुँ एक प्रधान।
जेन-केन विधि दीन्हें दान करह कल्याण।।

दान के सिलसिले में रहीम और तुलसी का संवाद एक बेहतरीन उदाहरण है। रहीम से तुलसीदास जी कहते हैं-

ऐसी देनी देन ज्यूँ, कित सीखे हो सैन।
ज्यों-ज्यों कर ऊँच्यो करो, त्यों-त्यों नीचे नैन।।

आप ऐसा दान कहां से सीखे हैं कि जैसे-जैसे हाथ ऊपर उठते हैं, वैसे-वैसे नजरें नीचे झुक जाती हैं। ऐसे निष्काम, निश्चल और विनम्र दान के बारे में पूछे गए गोस्वामी तुलसीदास के प्रश्न का रहीम उत्तर देते हैं-

देनहार कोई और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करैं, तासों नीचे नैन।।

सब कुछ देने वाला वह ईश्वर ही है, जो दिन-रात सबको दे रहा है। लोग तो बस भ्रम में मुझे दाता समझ लेते हैं। इसी शर्मिंदगी और विनम्रता के कारण मेरी नजरें झुक जाती हैं।
दान के बारे में कबीर का अपना दर्शन है। वे कहते हैं-

दान दिए धन न घटे, नदी घटे न नीर।
अपनी आँखों देखिए, यों कहि गए कबीर।।

दान निःस्वार्थ भाव से किया जाना चाहिए। परोपकार और दान करने से मनुष्य का धन कम नहीं होता, ठीक उसी तरह, जैसे नदी से पानी निकाल लेने या पक्षी द्वारा चोंच भर जल पीने से नदी का जल कम नहीं होता। संत शिरोमणि तुलसीदास भी इसी दर्शन के मुरीद हैं। वे कहते हैं-

तुलसी पंछी के पीए, घटै न सरिता नीर।
दान दिए धन न घटै, जो सहाय रघुबीर।।

तात्पर्य है कि ‘दान’ हमेशा निश्छल, निर्मल और परोपकारी भाव से होना चाहिए।

शस्त्रों मे दान का उल्लेख
शास्त्रों में दान की महिमा को अपरंपार बताया गया है। शुक्र नीति में दान को अत्यंत गोपनीय कार्य माना गया है-

आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम्।
छन्नमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत्।।

दक्ष स्मृति में भी यही वर्णित है कि जीवन में नौ कार्य अत्यंत गोपनीय होते हैं, जिनमें दान प्रमुख है। चाणक्य नीति के अनुसार, दान हमेशा गुप्त रूप से बिना किसी दिखावे के करना चाहिए। दान हाथों का श्रृंगार है-

दानेन पाणिर्न तु कंकणेन स्नानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन।
मानेन तृप्तिर्न तु भोजनेन ज्ञानेन मुक्तिर्न तु मण्डनेन।।

शास्त्रीय ग्रंथों में ‘दान’ को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पुण्य कर्म और नैतिक कर्तव्य माना गया है। कहा गया है कि दान जीवन के चार पुरुषार्थों की प्राप्ति में सहायक है। महाभारत में वर्णन है-

गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप।
दीयतां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः।।

    -महाभारत, आदिपर्व, 108-16

महर्षि वेदव्यास दान के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं-

शुभं सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं द्विज।
न चेत् सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं भवेत्।।

-महाभारत, अनुशासन पर्व 120.16

अर्थात जितने भी पवित्र कर्म हैं, उन सबमें दान ही सबसे बढ़कर पवित्र एवं कल्याणकारी है। दानदाता को प्राणदाता, धर्मपरायण और श्रेष्ठ माना गया है। जिस प्रकार वेदों का स्वाध्याय और सर्वस्व त्याग उत्तम माने जाते हैं, उसी प्रकार दान भी इस संसार में परम कल्याणकारी माना जाता है।

महाभारत में दान
महाभारत में दान

कितने प्रकार और उनके परिणाम
महाभारत में दान के कई प्रकारों की व्यवस्था है- धर्ममूलक दान, अर्थमूलक दान, भयमूलक दान, कामनामूलक दान, दयावश दान। भगवान श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर को दान के प्रकार बताते हुए कहते हैं कि ‘दान’ और उसके फल सात्त्विक, राजस और तामस भेदों के कारण तीन प्रकार के होते हैं-

राजसं सात्त्विकं चापितामसं च युधिष्ठिर।
दानं दानफलं चैव गतिं च त्रिविधाश्रयम्।।

उमा-महेश्वर के दान से संबंधित प्रसंग का महाभारत के अनुशासन पर्व में अत्यंत रोचक और तर्कसंगत वर्णन है, जिसमें ‘दान’ के फलों का उल्लेख है-

दुस्त्याजस्य च वै दानं पात्र आनन्त्यमुच्यते।
दानं षंगुणायुक्तं तु महद्व्यभिधीयते।।

जिस धन का त्याग करना अत्यंत कठिन हो और वह सुपात्र को दिया जाए, उसे ‘अनंत’ फल कहा गया है। छह गुणों से युक्त दान को ‘महद्’ माना गया है। श्रद्धा और यथायोग्य दान देना ‘सम’ कहा जाता है, जो मनुष्य लोक में सुख देता है। गुणों से रहित ‘दान’ को ‘हीन’ कहा जाता है। क्रियाशीलता के अभाव में ‘हीन’ दान को ‘हीन’ कहा जाता है। यदि छह गुणों के विपरीत दान किया जाए तो वह ‘पाप’ या ‘पातक’ कहलाता है, जिसका फल नरक या तिर्यक योनियों में मिलता है। भारतीय सनातन परंपरा में ‘दान’ को निःस्वार्थ कर्तव्य माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, दान का वास्तविक पुण्य तभी प्राप्त होता है, जब वह अहंकार, प्रदर्शन यानी दिखावे से मुक्त हो। श्रीमद्भगवद्गीता में दान की व्याख्या है-

दाता व्यक्तिमित्य यज्ञं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशकाले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विक स्मृतम्।।

अर्थात बिना प्रतिफल की अपेक्षा, कर्तव्य की भावना, उचित समय व स्थान और योग्य को दिया गया दान सात्त्विक माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

यशदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञोदानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।

अर्थात त्याग, दान, यज्ञ और तपस्या के कार्यों को त्यागना नहीं चाहिए। स्पष्ट है कि ‘दान’ शोभनीय हो तो सर्वश्रेष्ठ होता है,  क्योंकि दान को गुप्त रखने से अहंकार नहीं पनपता और दान की पवित्रता बनी रहती है-

गृह्यानि त्रीणि संसंसेवेत् परचित्तं कुलानि च।
छानं मानं च सम्मानं मानं न प्रकाशयेत्।।

भारतीय परंपरा में दान कभी संपत्ति के प्रदर्शन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि संवेदना, करुणा और लोकमंगल का विस्तार रहा है। इसलिए शास्त्र बार-बार कहते हैं कि दान की पवित्रता उसकी राशि में नहीं, बल्कि उसकी नीयत, पात्र और विनम्रता में निहित है। चढ़ावा आस्था का प्रतीक हो सकता है, समर्पण आत्मबोध का मार्ग बन सकता है, किंतु दान समाज के प्रति मनुष्य के उत्तरदायित्व का सबसे सुंदर रूप है। जब दान अहंकार, अपेक्षा और प्रचार से मुक्त होकर किया जाता है, तभी वह धर्म बनता है, पुण्य बनता है और देने वाले को भीतर से समृद्ध करता है।

मनुष्य होने का सबसे सुंदर भाव
भारतीय चिंतन में दान कभी संपत्ति का प्रदर्शन नहीं रहा, बल्कि संवेदना का विस्तार रहा है। इसलिए हमारे यहां दान का मूल्य उसकी राशि से नहीं, उसकी नीयत से तय होता है। चढ़ावा देवालय को समृद्ध कर सकता है, पर दान समाज को समृद्ध करता है। समर्पण मनुष्य को भीतर से बदल देता है। शायद इसी कारण भारतीय मनीषा ने दान को केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि मनुष्य होने की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियों में एक माना है।
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-

तुलसी दान जो देत हैं जल में हाथ उठाई।
प्रतिग्राही जीवे नहीं दाता नरके जाई।।

अर्थात जो व्यक्ति बिना विचार किए, केवल दिखावे या परंपरा निभाने के लिए जल हाथ में लेकर दान देता है, उसका दान न तो ग्रहण करने वाले के लिए हितकारी होता है और न ही दान देने वाले के लिए।

गोस्वामी तुलसीदास
गोस्वामी तुलसीदास

गोपनीय दान निस्वार्थ और शुद्ध मन से किया गया कल्याणकारी कार्य है, जबकि कुटिल दान अहंकार और स्वार्थ से भरा एक दिखावटी कर्म है।

मायाकारं लज्जामिः प्रत्युपक्रियया अथवा।
यत्किंचिद्दीयते दानं न तद्धर्मस्य साधकम्।।

यानी माया (छल), अहंकार, लज्जा के वश में होकर अथवा किसी उपकार के बदले प्रतिफल की इच्छा से जो कुछ भी दान किया जाता है, वह धर्म का साधन नहीं बनता।
लोक में एक प्रसिद्ध उक्ति है-

देता दायां हाथ है, बायां है अनजान।
जो प्रचार से है रहित, असली वो ही दान।।

अर्थात दान का सर्वोच्च रूप वही है, जिसमें दिखावा या यश की आकांक्षा न हो।

भारतीय परंपरा में दान केवल मंदिर की दानपेटी तक सीमित नहीं रहा। आज किसी अनजान व्यक्ति के लिए रक्त देना, मृत्यु के बाद अंगदान करना, किसी विद्यार्थी की पढ़ाई का खर्च उठाना या अपने समय और श्रम का निस्वार्थ योगदान भी उसी दान परंपरा का आधुनिक विस्तार है।

लेख-
डॉ. संजीव कुमार सिंह
संग्रहालय, अयोध्या

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