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पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अक्टूबर 2026

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पोला तिहार और कुशोत्पाटिनी अमावस्या

पोला तिहार और कुशोत्पाटिनी अमावस्या


भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ के पर्व मनुष्य, प्रकृति, पशु-पक्षियों, कृषि और जीवन-मूल्यों के  संबंधों को अभिव्यक्त करते हैं। हमारी संस्कृति में पोला पर्व और कुशोत्पाटिनी अमावस्या इसी प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि के दो महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। एक ओर पोला कृषक जीवन में बैलों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का पर्व है, तो दूसरी ओर कुशोत्पाटिनी अमावस्या हमारी पूजा-पद्धति में वनस्पतियों के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को सामने लाती है।

मध्य भारत के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में पोला पर्व का विशेष महत्व है। कृषि प्रधान समाज में बैल किसान के जीवन और आजीविका के अभिन्न अंग रहे हैं। खेत की जुताई से लेकर कृषि के अनेक कार्यों तक बैलों ने किसान का साथ दिया। इसलिए पोला उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।

किसान इस दिन अपने बैलों को विश्राम देता है। उन्हें नहलाया जाता है, सजाया जाता है और उनके सींगों पर रंग लगाया जाता है। गले में घंटियाँ, नई रस्सियाँ और आकर्षक सजावट की जाती है। घर की महिलाएँ और बच्चे भी इस उत्सव में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। बैलों की पूजा कर उन्हें विशेष आहार कराया जाता है। यह परंपरा वस्तुतः उस श्रम के प्रति सम्मान है, जिसके बल पर खेतों में अन्न पैदा होता है। पोला का मूल संदेश है जिसने हमारे जीवन और अन्न-उत्पादन में योगदान दिया, उसके प्रति कृतज्ञ होना हमारा नैतिक दायित्व है। आधुनिक कृषि में मशीनों का उपयोग बढ़ गया है, फिर भी हमारी संस्कृति में यह भावना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

पोला पर्व पर सजे बैल
पोला पर्व पर सजे बैल

पोला पर्व की एक विशेषता है: मिट्टी के बैल। कुम्हार मिट्टी से बैलों की आकृतियाँ बनाते हैं।  बच्चे मिट्टी के बैलों से खेलते हुए अनजाने में अपने समाज की कृषि परंपरा और हमारे सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित होते हैं। यह परंपरा बच्चों को कृषि व्यवस्था में पशुओं के महत्वपूर्ण योगदान से भी अवगत कराती है।


पोला के पारंपरिक मिट्टी के नंदिया-बैल

मिट्टी के बैल और खिलौनों से स्थानीय कुम्हार शिल्पकारों के आजीविका की भी व्यवस्था हो जाती हैं। आज कृषि यंत्रीकरण के दौर में ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनों ने खेती का स्वरूप बदल दिया है। फिर भी हमारे पर्वों में बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। 

कृषि उपकरण
आधुनिक कृषि उपकरण

पोला से पूर्व घास न काटने की परंपरा
लोकजीवन की अनेक परम्पराएं देखने में छोटी लगती हैं। लेकिन उनके पीछे कई महत्वपूर्ण अर्थ छिपे होते है। पोला पर्व से पूर्व घास न काटने की परम्परा को इसी दृष्टि से समझा जा सकता है। वर्षा ऋतु में खेतों, मेड़ों और आसपास के क्षेत्रों में वनस्पतियां तेजी से विकसित होती हैं। यह समय घास और अन्य वनस्पतियों को बढ़ने का पर्याप्त समय देना पर्यावरण और हमारी परिस्थतिकी तंत्र के लिए अच्छा है।


पूजा में उपयोगी कुश घास

घास पशुओं का चारा होने के साथ मिट्टी को बान्धने, नमी बनाए रखने और छोटे जीवों को आश्रय देने की भूमिका निभाती है। प्रकृति को नुकसान पहुंचाएं बिना और आवश्यकता के अनुसार लेने और उसके पुनर्जीवन के लिए समय देने की लोकमानस की समझ इन परम्पराओं में दिखाई देती है। ऋषियों ने इस विचार को अनुभव किया और इसे शास्त्रों में स्थान दिया। उन्होंने लोकजीवन के इस विज्ञान को समझा। इसे हमारी संस्कृति, पर्व और संस्कार के रूप में सुरक्षित किया।

इन्हीं लोक परम्पराओं से धीरे धीरे हमारे शास्त्रों का निर्माण। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भाद्रपद अमावस्या का कुशोत्पाटिनी अमावस्या (पोला मनाए जाने दिन) के रूप में स्थापित होना है।  लोक में पोला पर्व से पूर्व सामान्य घास या कांदी काटना वर्जित है। शास्त्रों ने ठीक इसी दिन पवित्र कुश उखाड़ने का समय निर्धारित किया। 

शास्त्रों ने यह विधान बनाया कि वर्ष भर के यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण और देवकार्यों के लिए कुश भाद्रपद अमावस्या को ही संचित किया जाएगा। इसके पीछे का तर्क रहा होगा कि वर्षा ऋतु में वनस्पतियों को स्वतन्त्र रूप से पनपने का पूरा समय मिले। तभी उनका उपयोग किया जाए। ऋषियों ने घास उखाड़ते समय प्रार्थना और मन्त्रोच्चार का नियम बनाया। 

कुशाग्रे वसते रूद्रः कुशमध्ये तु केशवः।
कुशमूले वसेद्‌ ब्रह्मा कुशान्मे देहि मेदिनी॥

अर्थात, कुश के अग्रभाग में भगवान शिव निवास करते हैं। इसके मध्य भाग में भगवान विष्णु का वास है। कुश की जड़ में भगवान ब्रह्मा निवास करते हैं। हे पृथ्वी माता! आप मुझे यह कुश प्रदान करें।
कुशोऽसि कुशपुत्रोऽसि ब्रह्मणा निर्मितः पुरा।
देवपितृहितार्थाय कुशमुत्पाट्याम्यहम्‌॥

हे कुश! तुम अत्यन्त पवित्र हो। प्राचीन काल में स्वयं ब्रह्मा जी ने तुम्हारी रचना की थी। मैं देवताओं और पितरों के कल्याण के लिए तुम्हें उखाड़ रहा हूँ।

इस मन्त्र के मूल भाव में मनुष्य प्रकृति के प्रति अपनी विनम्रता प्रकट करता है। उसकी मान्यता है कि वनस्पति के प्रत्येक अंश में ईश्वर का वास है। वह देव और पितृ कार्यों के लिए पृथ्वी माता से विनयपूर्वक अनुमति लेता है। अनुमति लेने के पश्चात ही वह उसे ग्रहण करता है। प्रकृति के दोहन की जगह उसके प्रति कृतज्ञता जताना ही इस मन्त्र का मुख्य उद्देश्य है।

लोकमानस ने प्रकृति के साथ रहकर जो सहज अनुभव प्राप्त किए थे, ऋषियों ने उन्हें कर्मकाण्डों और धर्मशास्त्रों के माध्यम से समाज में मानक रूप दिया। लोक का अनुभव और शास्त्रों का ज्ञान मिलकर एक सुदृढ़ परम्परा बन गए। हजारों वर्षों से इस परम्परा को अब तक बचाए रखने के लिए किसी कानून की आवश्यकता नहीं पड़ी वह हमारी संस्कृति की ही देन है, कि आज भी लोग पोला से पूर्व घास न काटने की परंपरा विद्यमान है। यह लोक और शास्त्र के इस समन्वय का प्रमाण है। 


लोक और शास्त्र का चक्र

आज के बच्चों का जीवन गाँव की पारंपरिक कृषि व्यवस्था से पहले की तुलना में कम जुड़ा हुआ है। इसलिए पोला और कुशोत्पाटिनी अमावस्या जैसे पर्वों को एक धार्मिक आयोजन जैसा न देखकर उन्हें लोकज्ञान और श्रुति से जोड़ना चाहिए। विद्यालयों में मिट्टी के बैल बनाने की गतिविधि, स्थानीय कृषि उपकरणों की प्रदर्शनी, पशु-संरक्षण पर चर्चा, औषधीय एवं उपयोगी वनस्पतियों की पहचान, लोकगीतों और लोककथाओं का संकलन जैसी गतिविधियाँ आयोजित की जा सकती हैं। इससे बच्चों में अपनी संस्कृति के प्रति गौरव और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी दोनों विकसित होंगे।

लेख-
भागचंद चतुर्वेदी 
राजिम, छत्तीसगढ़

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