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महात्मा गांधी: सत्य और अहिंसा के प्रतीक

महात्मा गांधी: सत्य और अहिंसा के प्रतीक


आज से करीब सौ साल पहले के का दृश्य। एक आदमी है। दुबला पतला शरीर। घुटनों तक की धोती। हाथ में एक साधारण सी लाठी। कोई बड़ी सरकारी कुर्सी नहीं। उनके पास न कोई हथियार है, न सत्ता। फिर भी उनकी आवाज लंदन तक सुनाई देती है। अमेरिका के अखबार उनकी खबर छापते हैं। दुनिया के अलग अलग हिस्सों में बैठे लोग उनके विचारों पर चर्चा करने लगते हैं।
कैसे एक छोटे से शहर में जन्मा मोहनदास करमचन्द गांधी, दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष करता हुआ एक वकील, महात्मा और फिर पूरी दुनिया के लिए एक आवाज बन गया? इस कहानी को समझने के लिए गांधी जी की पूरी जिन्दगी पढ़ना जरूरी नहीं है। उनके जीवन के तीन प्रसंग ही काफी हैं। तीन ऐसे दृश्य, जिनमें एक आदमी धीरे धीरे नेतृत्वकर्ता बनता दिखाई देता है। शायद यही वे तीन दृश्य हैं, जिनमें आज के हमारे जीवन के लिए भी कई प्रेरणा छिपी हुई है।

पहला प्रसंग: अफ्रीका में अपमान से जन्मा हौसला
साल 1906। जगह थी जोहान्सबर्ग। ट्रांसवाल की सरकार भारतीयों पर एक ऐसा कानून थोपना चाहती थी, जिसके तहत उन्हें पंजीकरण कराना था और पहचान का प्रमाण साथ रखना था। भारतीय समुदाय के लिए यह केवल सरकारी दस्तावेज का मामला नहीं था। उन्हें यह अपमान जैसा लगता था, मानो उन्हें सामान्य नागरिक नहीं, बल्कि सन्देह की नजर से देखे जाने वाले लोग समझा जा रहा हो।

11 सितम्बर 1906 को जोहान्सबर्ग के एम्पायर थिएटर में हजारों भारतीय जमा हुए। माहौल में डर था। सामने एक ताकतवर सरकार थी। दूसरी तरफ वे लोग थे, जिनके पास न सेना थी, न राजनीतिक शक्ति। तभी एक 37 साल का वकील मंच पर खड़ा हुआ। नाम था मोहनदास गांधी। उन्होंने लोगों से कहा कि अन्यायपूर्ण कानून को स्वीकार करना जरूरी नहीं है। अगर इसके विरोध में जेल जाना पड़े, तो जेल जाएंगे। अगर कष्ट सहना पड़े, तो सहेंगे। लेकिन अपने आत्मसम्मान को बेचकर कानून मान लेना रास्ता नहीं है।

दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास गांधी
दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास गांधी

यहीं से सत्याग्रह की वह यात्रा शुरू हुई, जिसने आगे चलकर दुनिया की राजनीति की भाषा बदल दी। गांधी जी ने संघर्ष का एक अलग रास्ता दिखाया। विरोध करना है, लेकिन विरोध करने वाले से नफरत नहीं करनी है। अन्याय का सामना करना है, लेकिन बदला लेने के लिए हिंसा का सहारा नहीं लेना है। यह बात सुनने में सरल लगती है, लेकिन इसे अपने जीवन में उतारना आसान नहीं है।

जब कोई हमारा अपमान करता है, तो हमारा पहला स्वभाव क्या होता है? हम जवाब देना चाहते हैं। उससे भी तेज शब्दों में। कभी कभी उससे भी अधिक चोट पहुँचाकर। गांधी ने कहा, असली ताकत सामने वाले को हराने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध पर नियन्त्रण रखने में है। गांधी जी गिरफ्तार हुए। जेल गए। उनके साथियों को भी जेल जाना पड़ा। कई लोगों को मारपीट और कठोर दमन का सामना करना पड़ा। फिर भी आन्दोलन चलता रहा। 1908 में पंजीकरण प्रमाणपत्रों की सार्वजनिक होली ने इस संघर्ष को एक पहचान दे दिया।

टॉल्स्टॉय फार्म का सामुदायिक प्रयोग
टॉल्स्टॉय फार्म का सामुदायिक प्रयोग

यहाँ गांधी जी की नेतृत्व शैली का एक महत्वपूर्ण गुण दिखाई देता है। वे केवल भाषण देने वाले नेता नहीं थे। वे वही करते थे, जो दूसरों से करने को कहते थे। इसलिए लोग उन्हें मानने लगे। दक्षिण अफ्रीका में उनका संघर्ष वर्षों तक चला। वहाँ उन्होंने केवल विरोध करना नहीं सीखा, बल्कि लोगों के साथ रहना, उनके परिवारों की चिन्ता करना, समुदाय बनाना और अपने जीवन को भी उसी अनुशासन में ढालना सीखा। टॉल्स्टॉय फार्म इसी प्रयोग का एक उदाहरण था, जहाँ अलग अलग धर्मों और क्षेत्रों से आए लोग साथ रहते और काम करते थे।

यहीं से गांधी जी केवल एक वकील नहीं रहे। वे ऐसे नेता बनने लगे, जिनका नेतृत्व उनके पद से नहीं, उनके आचरण से पैदा होता था। 1915 में जब वे भारत लौटे, तो उनके पास कोई बड़ी राजनीतिक पद नहीं थी। लेकिन उनके पास ऐसा अनुभव था, जो किसी किताब से नहीं मिल सकता था। उन्होंने देख लिया था कि बिना हथियार के भी अन्याय के सामने खड़ा हुआ जा सकता है, बशर्ते सामने खड़े होने वालों में सत्य और अनुशासन हो।

दूसरा प्रसंग: जब एक मुट्ठी नमक ने दुनिया का ध्यान खींचा
1930 तक गांधी जी भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में आ चुके थे। लेकिन दुनिया के लिए अभी भी वे एक असामान्य व्यक्तित्व थे। नमक, जिसे हर गरीब और अमीर इस्तेमाल करता था। अंग्रेजों ने भारतीय नमक कानून (Indian Salt Act) बनाया था, जिसके तहत नमक के उत्पादन और बिक्री पर ब्रिटिश सरकार का एकाधिकार स्थापित कर दिया गया। ऐसा साधारण पदार्थ, जिसे रसोई में देखकर शायद ही कोई राजनीति के बारे में सोचे। गांधी जी ने नमक को चुना क्योंकि अंग्रेजी सरकार का नमक कानून आम आदमी की रोजमर्रा की जिन्दगी को छूता था। उन्होंने वायसराय को पत्र लिखकर अपने विरोध की सूचना दी। सरकार ने शायद सोचा होगा कि नमक जैसी छोटी चीज पर इतना बड़ा आन्दोलन कैसे खड़ा हो सकता है।

दांडी की ओर बढ़ता सत्याग्रह
दांडी की ओर बढ़ता सत्याग्रह

गांधी जी ने इसका उत्तर भाषण से नहीं, पैदल चलकर दिया। 12 मार्च 1930 की सुबह लगभग साढ़े छह बजे गांधी जी साबरमती आश्रम से 78 सत्याग्रहियों के साथ दांडी की ओर चल पड़े। मंजिल समुद्र के किनारे लगभग 240 मील दूर थी। सोचिए, उस समय न सोशल मीडिया था, न टेलीविजन चैनल और न कोई आधुनिक प्रचार व्यवस्था। एक बूढ़ा होता जा रहा आदमी, हाथ में लाठी लिए पैदल चल रहा था।

लेकिन रास्ते में लोग जुड़ते गए। गाँवों में लोग पानी लेकर खड़े होते। महिलाएँ स्वागत करतीं। बच्चे उन्हें देखने के लिए दौड़ते। पत्रकार इस यात्रा का पीछा कर रहे थे। हर दिन यह यात्रा केवल आगे नहीं बढ़ रही थी, लोगों के मन में एक विचार भी आगे बढ़ रहा था। 6 अप्रैल को दांडी के समुद्र तट पर गांधी जी ने नमक कानून तोड़ा। एक मुट्ठी नमक। इतनी सी बात। लेकिन उस मुट्ठी में लाखों भारतीयों का असन्तोष दिखाई देने लगा।

इसके बाद देश के अलग अलग हिस्सों में नमक कानून के खिलाफ आन्दोलन फैल गया। गिरफ्तारियाँ हुईं। लाठियाँ चलीं। हजारों लोग जेल गए। धरासन (दांडी के निकट) में सत्याग्रहियों पर हुए दमन की रिपोर्ट अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने दुनिया तक पहुँचाई। दुनिया ने पहली बार इतनी स्पष्टता से देखा कि निहत्थे लोग भी किसी साम्राज्य की नैतिक नींव को चुनौती दे सकते हैं। यही गांधी जी के नेतृत्व की दूसरी बड़ी खूबी थी। वे बड़ी समस्या को लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी से जोड़ देते थे। आज के जीवन में भी यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है। कोई नेता कितना भी बड़ा विचार क्यों न दे, अगर सामान्य आदमी उसे अपने जीवन में महसूस नहीं कर पाता, तो वह विचार कागज पर ही रह जाता है।

एक मुट्ठी नमक उठाते हुए गांधी जी 
एक मुट्ठी नमक उठाते हुए गांधी जी 

गांधी जी ने स्वतन्त्रता को नमक से जोड़ दिया। उन्होंने चरखे को जोड़ा। गाँव को जोड़ा। खादी को जोड़ा। उन्होंने आम आदमी को यह महसूस कराया कि स्वतन्त्रता केवल बड़े नेताओं का विषय नहीं है। इसमें उसकी भी भूमिका है। इसके बाद दुनिया का ध्यान उनकी ओर गया। लन्दन में वे गोलमेज सम्मेलन में गए। उनका पहनावा वही साधारण धोती था, लेकिन अब दुनिया उन्हें पहचानती थी। लन्दन के आम लोग भी उन्हें देखने के लिए सड़कों पर खड़े होते थे। जिस आदमी के पास कोई राजनीतिक शक्ति नहीं थी, उसकी यात्रा दुनिया के अखबारों की खबर बन चुकी थी।

तीसरा प्रसंग: जब देश जल रहा था
1942। दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था। भारत में स्वतन्त्रता की माँग तेज हो चुकी थी। 8 अगस्त को मुंबई में गांधी जी ने अंग्रेजी शासन से साफ कहा कि अब भारत को और इन्तजार नहीं करना चाहिए। नारा था, "करो या मरो।" अगली सुबह गांधी जी  गिरफ्तार कर लिए गए। लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। 1947 में भारत स्वतन्त्र हुआ। लेकिन स्वतन्त्रता के साथ विभाजन और साम्प्रदायिक हिंसा की त्रासदी भी आई। देश के कई हिस्सों में हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे के दुश्मन बन गए थे। ऐसे समय में गांधी जी के पास दो रास्ते थे।

वे दिल्ली में रह सकते थे। बड़े नेताओं के साथ बैठ सकते थे। स्वतन्त्र भारत की राजनीति के केन्द्र में रह सकते थे। लेकिन उन्होंने कुछ और चुना। वे उस जगह गए, जहाँ लोग सबसे अधिक डरे हुए थे। नोआखली में वे गाँव गाँव चले। कीचड़ भरे रास्तों पर, बिना किसी सुरक्षा के। वे उन लोगों के बीच गए, जो एक दूसरे से डर रहे थे। उन्होंने हिन्दुओं से कहा कि वे डरकर अपना घर न छोड़ें। उन्होंने मुसलमानों से कहा कि उन्हें भी सुरक्षित रहने का अधिकार है।

नोआखली में गांधी जी 
नोआखली में गांधी जी 

यहाँ गांधी जी लोगों के बीच बैठ रहे थे। आज हम नेतृत्व को अक्सर मंच, माइक, पद से जोड़ते हैं। गांधी जी ने उसके उलट रास्ता दिखाया। जब लोग उनसे दूर जा रहे थे, वे उनके पास गए। जब लोग एक दूसरे को सुनना नहीं चाहते थे, वे दोनों पक्षों के बीच खड़े हुए।

फिर कलकत्ता में हिंसा भड़की। गांधी जी ने अनशन शुरू कर दिया। उनका शरीर कमजोर था। उम्र 78 के करीब थी। लेकिन उनका संकल्प अब भी उतना ही मजबूत था। हिंसा रोकने के लिए लोग उनके पास आए। हथियार छोड़ने और शान्ति कायम करने के प्रयास हुए। इसी दौर में लॉर्ड माउंटबेटन ने कलकत्ता की स्थिति की तुलना पंजाब से करते हुए गांधी जी की भूमिका को असाधारण बताया था। उनके शब्दों में, पंजाब में हजारों सैनिकों के बावजूद बड़े पैमाने पर हिंसा थी, जबकि बंगाल में गांधी की उपस्थिति ने अलग परिणाम पैदा किया।

यहीं शायद गांधी जी के जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। जिस आदमी ने लाखों लोगों को आन्दोलन के लिए खड़ा किया, वही आदमी जीवन के अन्तिम वर्षों में भीड़ से दूर होकर अकेले उन गलियों में चला गया, जहाँ कोई कैमरा नहीं था, कोई मंच नहीं था और कोई राजनीतिक लाभ नहीं था। शायद यही कारण है कि गांधी जी का प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर गया।

डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर महात्मा गांधी की समाधि (राजघाट) में
डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर महात्मा गांधी की समाधि (राजघाट) में 

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने गांधी जी के अहिंसक संघर्ष से गहरा प्रभाव ग्रहण किया और बाद में उनके विचारों को अमेरिका के नागरिक अधिकार आन्दोलन में अपनाया। दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने भी गांधी जी के विचारों और उनके संघर्ष की विरासत को अपने चिन्तन और देश के मुक्ति संघर्ष के सन्दर्भ में स्वीकार किया।

गांधी जी की ताकत कुछ और थी। उन्होंने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि सामान्य आदमी भी अन्याय के सामने खड़ा हो सकता है। उन्होंने बताया कि नेतृत्व करना सिर्फ लोगों को आदेश देने का नाम नहीं है। नेतृत्व कभी सबसे आगे चलने का नाम है, कभी सबसे पीछे रहकर दूसरों को आगे बढ़ाने का और कभी उस जगह अकेले खड़े होने का, जहाँ खड़े होने वाला कोई और दिखाई नहीं देता। 2 अक्टूबर उनकी जयंती पर जब हम गांधी जी को याद करें, तो केवल चश्मा, लाठी और चरखे की तस्वीर याद न करें। उस आदमी को याद करें, जिसने दक्षिण अफ्रीका में अपमान का जवाब आत्मसम्मान से दिया। उस आदमी को याद करें, जिसने दांडी में दिखाया कि एक मुट्ठी नमक भी लाखों लोगों की आवाज बन सकती है। और उस बूढ़े आदमी को याद करें, जो आजादी के ठीक पहले सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि हिंसा से टूटे गाँवों की गलियों में चल रहा था। क्योंकि गांधी जी की सबसे बड़ी कहानी शायद यह नहीं है कि उन्होंने दुनिया को बदल दिया।

उनकी सबसे बड़ी कहानी यह है कि उन्होंने यह विश्वास जगाया कि एक अकेला इंसान भी अपने सत्य पर टिककर खड़ा हो जाए, तो उसकी आवाज उसकी देह से कहीं ज्यादा दूर तक जा सकती है। शायद इसी वजह से वे केवल भारत के बापू नहीं रहे। उनकी कहानी सीमाओं से बाहर चली गई। और देखते देखते, वह आदमी जो कभी दक्षिण अफ्रीका में एक अपमानित भारतीय वकील के रूप में खड़ा हुआ था, विश्व के करोड़ों लोगों के अन्तरात्मा की आवाज बन गया।

लेख-
श्रीनिवास चारी
नेरेडमेट, हैदराबाद

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