कर्मा पर्व: लोक आस्था का महापर्व
September 22, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल षष्ठी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: शोभन | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अक्टूबर 2026

भारतीय संस्कृति में पर्व और अनुष्ठान लोकजीवन को दिशा देते हैं। ये पर्व सामाजिक एकता, पारिवारिक सम्बन्ध और प्रकृति के प्रति सम्मान के भाव को दृढ़ करते हैं। करमा पूजा मध्य भारत की जनजातीय संस्कृति का एक प्रमुख लोक पर्व है। यह पर्व छत्तीसगढ़, झारखण्ड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश और असम के सीमावर्ती क्षेत्रों में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। कृषि जीवन, प्रकृति और कर्म का विचार इस पर्व के मूल में विद्यमान है।
हिंदू पञ्चाङ्ग के अनुसार यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं। गाँव के अखरा अथवा सार्वजनिक स्थल पर करम वृक्ष की डाल लाकर गाड़ी जाती है, जिसे करम देवता का प्रतीक माना जाता है। लोग अच्छी फसल, पारिवारिक सुख और कल्याण की प्रार्थना करते हैं। परिवार की महिलाएँ और बहनें निर्जला उपवास रखकर भाइयों की दीर्घायु और सुख की कामना करती हैं। पूजा स्थल पर करम देवता की कथा सुनी जाती है और रात भर नृत्य एवं गीतों का क्रम चलता है।

करम डाल की पूजा
कृषि से जुड़ाव इस पर्व का मुख्य आधार है। विन्ध्य और सतपुड़ा अञ्चल के ग्रामीण क्षेत्रों में इसका व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। शहडोल और मण्डला के गोण्ड और बैगा समुदाय तथा बालाघाट और सिवनी के कोरकू एवं परधान समुदाय करमा के विभिन्न रूपों को प्रस्तुत करते हैं। इनमें बैगा करमा, गोण्ड करमा और भुइयाँ करमा प्रमुख हैं। पूजा के अवसर पर मनौती मानने वाले श्रद्धालु सम्बन्धियों और पड़ोसियों को आमन्त्रित करते हैं। कुल्हाड़ी के एक ही प्रहार से करम वृक्ष की डाल काटी जाती है और उसे भूमि पर गिरने नहीं देते। अगले दिन इस डाल को नदी अथवा जलस्रोत में विसर्जित कर दिया जाता है। नई फसल के आगमन पर कुल देवताओं को नवान्न अर्पित करने के बाद ही नया अन्न ग्रहण करने का नियम है।
करमा पूजा से सम्बन्धित लोककथाएँ इस पर्व के नैतिक आधार को स्पष्ट करती हैं। एक प्रसिद्ध लोककथा कर्मा और धर्मा नामक दो भाइयों की है। दोनों भाई परिश्रमी और दयालु थे। कर्मा की पत्नी के अनुचित आचरण से दुःखी होकर कर्मा घर छोड़ देता है। उसके जाने के बाद क्षेत्र में अकाल और विपत्तियाँ आ जाती हैं। धर्मा अपने भाई को खोजने निकलता है और उसे वापस ले आता है। कर्मा सभी को सही आचरण की सीख देता है। उसके लौटने और करम डाल की पूजा करने से क्षेत्र में पुनः सुख और सम्पन्नता लौट आती है।
सामूहिक करमा लोकनृत्य
एक अन्य कथा में सात भाइयों और उनकी पत्नियों का उल्लेख मिलता है, जहाँ करम वृक्ष के प्रति अनादर से परिवार को कष्ट उठाने पड़े। भूल सुधारकर श्रद्धापूर्वक पूजा करने पर उनका जीवन पुनः सामान्य हो गया। कुछ क्षेत्रों में करमसेनी देवी, राजा कर्म अथवा भगवान विश्वकर्मा से भी इस कथा को जोड़ा जाता है। ये कथाएँ सन्देश देती हैं कि परिश्रम, सत्य और अनुशासन ही जीवन को सुरक्षित रखते हैं।
करमा पर्व की तैयारियाँ मुख्य तिथि से 7 से 9 दिन पूर्व प्रारम्भ होती हैं। महिलाएँ तीजा के दिन से ही बाँस की टोकरियों में बालू भरकर जौ, गेहूँ, चना, मक्का और धान के बीज बोती हैं। इसे स्थानीय बोली में 'जाईं' या 'जावा' कहते हैं। यह कार्य प्रातः काल किया जाता है। नियमित देखभाल से एकादशी तक ये बीज अंकुरित हो जाते हैं, जिन्हें उर्वरता और हरियाली का प्रतीक माना जाता है।
जावा की पूजा तैयारी
पूजा के दिन जावा की टोकरियों को फूलों और फलों से सजाकर अखरा में स्थापित किया जाता है। मान्दर, झाँझ, ढोल और मोहरी जैसे पारम्परिक वाद्यों के साथ सामूहिक नृत्य होता है। महिलाएँ एक दूसरे का हाथ थामकर घेरा बनाती हैं और पुरुष बीच में रहकर वाद्य एवं गायन सम्भालते हैं। भोर होने से पूर्व करम डाल का विसर्जन जलाशय में कर दिया जाता है।
भाई और बहन का स्नेह
करमा पूजा का एक भावनात्मक पक्ष भाई और बहन के स्नेह से जुड़ा है। बहनें अपने भाइयों के कल्याण के लिए कठिन व्रत रखती हैं। यह परम्परा रक्षाबन्धन के भाव से पूरी तरह मेल खाती है। पुराणों में वर्णित भाई और बहन के आदर्श सम्बन्धों की तरह ही करमा पर्व भी लोक स्तर पर पारिवारिक दायित्वों और सामाजिक मर्यादा को जीवन्त रखता है।
लेखिका:
अलका यादव
प्राचार्य, विष्णु कान्ति महाविद्यालय, छितापार, लोरमी, जिला मुंगेली (छत्तीसगढ़)
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