सतपुड़ा की रानी - पचमढ़ी
September 29, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल षष्ठी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: शोभन | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अक्टूबर 2026

भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश का माण्डू, इतिहास और पर्यटन की दृष्टि से एक ऐसा सौन्दर्यशाली स्थल है जो देश-विदेश के पर्यटकों के लिए खास आकर्षण का केन्द्र है। यहां प्राकृतिक और पुरातात्त्विक सौन्दर्य एवं सम्पदा का भी अद्भुत समन्वय है। वर्षा ऋतुकाल में तो यहां का सौन्दर्य बस देखते ही बनता है। विशाल मैदानों में ऊगी घांस मखमली चादर सी बिछी हुई प्रतीत होती है। इन सभी विशेषताओं पर मुग्ध होकर भारत के पूर्व वायसराय लार्ड कर्जन ने स्पष्ट रूप से लिखा कि- ‘‘ऐतिहासिक वास्तुकला और नैसर्गिक सौन्दर्य की दृष्टि से माण्डू ने जितना मुझे प्रभावित किया उतना तो भारत के किसी अन्य स्मारक ने नहीं।’’ मूलतः माण्डू के स्मारक इतिहास और पर्यटन की ऐसी प्रेम गाथा का भी आख्यान करने के लिए देशभर में सुविख्यात है जो मुख्य रूप से अनिद्य सुन्दरी रानी रूपमती और बाज बहादुर की पवित्र प्रेम गाथा से जुड़ी है। इन दोनों महान संगीत-प्रेमियों के ये स्थल माण्डू के प्राण है जिनमें आज भी रस और वैभव है।
माण्डू प्राचीनकाल में मालवा के परमार राजाओं का दुर्ग एवं प्रमोद स्थल रहा है। राजा मुंजदेव और राजाभोज का नाम इनमें प्रसिद्ध है। माण्डू में अनेक मुगल शासक भी आये और रहे जिन्होंने विशालतम राजप्रासाद, सभा भवन, मस्जिदें, मकबरे, जलाशय, फव्वारें, प्रेक्षागृह बनवायें। इसी समय समीप की नर्मदा नदी की गोद में पली अनिद्य सुन्दरी रानी रूपमती और सुल्तान बाज बहादुर के संगीत व काव्य की स्वर लहरियां यहां की उपत्यकाओं में गूंज उठी थी।
भारत के अनेक मुगल सम्राटों का माण्डू में आने व इसे अपनी राजधानी बनाने का उल्लेख अनेक भारतीय इतिहास ग्रन्थों में है। इनमें अलाउद्दीन खिलजी, सम्राट अकबर, मोहम्मद बिन तुगलक, दिलावर खां गौरी, होशंगशाह गौरी, महमूद खिलजी, जहांगीर आदि के नाम है। इन शासकों ने यहां अपनी राजनैतिक बाजियां भी खेली और सुन्दर निर्माण भी करवाये। ये सारे स्थल आज भी इतिहास के साथ-साथ पर्यटन एवं कला की भी सुन्दर निधियां है, जिसमें जीवन्त गाथा को देशी-विदेशी पर्यटक यहां आकर महसूस कर सकते हैं।

प्रकृति की गोद में माण्डू
माण्डू घूमने का अनुकूल मौसम जुलाई से फरवरी तक का होता है। इन महिनों में वर्षा ऋतु के समय माण्डू घूमने का सबसे उपयुक्त समय है। वायुसेवा से माण्डू पहंुचने का निकटतम बड़ा हवाई अड्डा इन्दौर है जो माण्डू से 99किमी है। रेल्वे मार्ग से मुम्बई-दिल्ली मार्ग पर रतलाम (124किमी) तथा इन्दौर स्टेशन सर्वश्रेष्ठ है। यहां से कार द्वारा आसानी से माण्डू पहुंचा जा सकता है। इनके अतिरिक्त इन्दौर, धार, महू, भोपाल, उज्जैन से माण्डू के लिये नियमित बस सेवायंे भी उपलब्ध है। माण्डू में पर्यटकों के रूकने के लिए लगभग चार दर्जन उच्च स्तरीय होटल्स तथा दो दर्जन से अधिक रेस्टोरेन्ट है।
माण्डू के प्रत्येक पर्यटन स्थल से इतिहास की रोचक गाथाएं जुड़ी है। यहां के सुन्दर प्रमुख स्थलों का परिचय इस प्रकार है
यहां प्रवेश करते ही पर्यटकों के ध्यान को जो स्थली सबसे अधिक आकर्षित करती है वह है ‘‘काकड़ खो’’ अर्थात् गहरी खाई। इस खाई का नैसर्गिक सौन्दर्य बड़ा सुन्दर है। बारिश के मौसम में जब पहाड़ी से पानी खाई में गिरता है तो वह दृश्य देखने लायक होता है। इसके आगे ‘‘सात कोठड़ी’’ नामक स्थल है जहां परमार युगीन गुफाएं दर्शनीय है। यहां का आलमगीर दरवाजा मध्ययुगीन स्थापत्यकला का सुन्दर उदाहरण है। इस दरवाजे की ऊंची दीवारों से प्रतीत होता है कि यह सुरक्षा की दृष्टि से बनवाई गई होगी। उस युग में माण्डू आने वाले कई सम्राटों ने इसी द्वार से प्रवेश किया था। इसी प्रकार यहां हाथीपोल, जहांगीरपुर, भगवानपुर, तारापुर नामक जंगी दरवाजे है जो मध्ययुग की घटनाआंे के मूक साक्षी है। इन सभी दरवाजों के मध्य मोटी शहर पनाह है, जिनके अन्दर अनेक सुन्दर मध्ययुगीन महल है।
गदाशाह का महल एवं दुकान:- यह माण्डू का शाही परिसर है जिसमें विशाल महल और भारतीय धरोहरों में सबसे विशालतम दुकान है। गदाशाह का मूलनाम मेदिनीराय था। वह माण्डू सुल्तान महमूद खिलजी (द्वितीय) का विश्वस्त व्यक्ति था जो अपने दम पर अल्प समय के लिये माण्डू का स्वामी भी बन बैठा था। ऐसा भी कहा जाता है कि वह यहां का एक प्रतिष्ठित व्यापारी था जो आर्थिक संकट के समय माण्डू के शासकों की अपनी अकूत सम्पदा से मदद किया करता था। गदाशाह के इस भवन की बनावट हिन्दू स्थापत्य का विशाल नमूना है। इसमें दो कलात्मक बावड़ियां है जिन्हें अंधेरी और उजाली बावड़ी कहा जाता है। यह महल दो विशाल मंजिला है जिसके नीचे अतिसुन्दर मेहराबदार दरवाजे व सुन्दर कक्ष है। ऊपरी मंजिल में एक विशाल हाल व कई कमरे है। महल के अन्दर के सुन्दर कक्ष मेदिनीराय की स्त्री, बालकों व अन्य परिवारजनों के है।

माण्डू की ऐतिहासिक गदाशाह दुकान
नाहर झरोखा:- इस झरोखे का निर्माण सम्राट जहांगीर के समय हुआ था। इस झरोखे से वह प्रतिदिन अपनी प्रजा की समस्याएं सुनता व दर्शन किया करता था। इस झरोखे के द्वार पर बाघ की मूर्ति होने से इसका नाम ‘‘नाहर झरोखा’’ हुआ। यहां से माण्डू की प्राकृतिक दृश्यावली का आनन्द लिया जा सकता है। हिण्डौला महल:- शाही परिसर में स्थित है मध्ययुगीन हिण्डौला महल। इसकी पाश्र्व भित्तियांे के झुके होने के कारण यह महल हिण्डौला (झूला) के समान प्रतीत होता है। इस भवन की निर्मिती अंग्रेजी के ‘‘टी’’ अक्षर की भांति है। यह मजबूत सुघड़ पाषाणों का बना विशाल सभा मण्डप है जो मध्ययुग में मालवा के सुल्तानों का ‘दीवान-ए-खास’ महल था। इसके भीतर भाग में ढालू मार्ग के नीचे से इस महल के ऊपर तक इस प्रकार की तकनीक से निर्मित किया गया था कि उस पर होकर शाही परिवार को बेगमें, पालकी, घोड़े या हाथी पर बैठे-बैठे ही ऊपरी मंजिल तक पहंुच सके। इस कारण से इस मार्ग का नाम हाथीचढ़ाव रखा गया।
चम्पा बावड़ी:- मंुज तालाब के उत्तर में स्थित यह बड़ी गहरी बावड़ी है जो विशाल शाही महल का हिस्सा थी। इस बावड़ी की मनोरंजक बात यह रही है कि इसका सम्बन्ध शाही तहखाने से है जिसमें सुरक्षित कमरे है जो मंुज तालाब के प्रेक्षाकक्ष तक भू-गर्भ मार्ग से जुडे हुए है। यह रहस्यमयी व्यवस्था इस विचार से की गई होगी जिससे मुंज ताल के स्पर्श से प्रभावित शीतल वायु उक्त मार्ग द्वारा बावड़ी के भीतर बने विश्राम गृहों तक पहुंच सके। यह आधुनिक एयर कंडीशन व्यवस्था की भांति है। चम्पा बावड़ी के समीप ही ‘हम्माम’ स्थित है। जिसकी छत में प्रकाश के भीतर आने के लिये सितारेनुमा सुन्दर झरोखे बनाये गये थे। इसमें गरम और ठण्डे पानी की व्यवस्था की जाती थी।
जहाज महल:- कपूर एवं मंुज तालाब के मध्य स्थित यह महल सबसे ज्यादा पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहता है। यहां के सौन्दर्य को पर्यटक एकटक निहारता रहता है। इस महल के नाम के पीछे यह धारणा है कि वर्षा ऋतु में जब महल के दोनों ओर के तालाब जल से भर जाते है, तब यह भव्य महल पानी में लंगर डाले जहाज की भांति दिखायी देता है। इसका निर्माण शृंगार प्रेमी सुल्तान ग्यासुद्दीन (1469-1500ईस्वी) ने करवाया था।

जहाज महल
लाल पत्थर से निर्मित इस महल में मुगल शैली में बने झरोखे व अन्य वास्तुकला जहाज महल को अतिभव्य और सुन्दर रूप प्रदान करती है। सम्राट जहांगीर ने इस महल की एक खूबसूरत रात्रि का वर्णन अपनी दिनचर्या में लिखा है जो ‘अरेबियन नाईट्स’ की कथाओं के समान अद्भुत और रोचक है। मालवे की शीतल रात्रि में जगमगाते दीपों से ज्योतित और दिव्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत सुन्दरियों तथा सुन्दर दरबारियों से युक्त जहाज महल के सभी भवन की कल्पना कोई भी सहज में कर सकता है। यह सब उस समय की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी नूरजहां के वैभव के अनुकूल ही थी। अब भी जब कि यह भव्य राजप्रासाद निर्जन है, यदि कोई उसके भवनों का अवलोकन करता है या उसकी छतों पर घूमता है अथवा जलाशयों की ओर निहारता है तो उस मनोरमता का अनुभव करता है जिसका यहां एक समय निश्चित ही अधिपत्य था। इस महल के पीछे परमार राजाओं द्वारा बनवाया अति मनोहारी मुंजताल और सामने कपूर तालाब है।
होशंगशाह का मकबरा:- होशंगशाह माण्डू का 15वीं सदी में विख्यात सुल्तान था। उसका मकबरा भी उसकी ख्याति के अनुरूप है। बादशाह शाहजहां ने ताजमहल बनाने से पूर्व शिल्पकारों को यहां इस मकबरे का अध्ययन करने हेतु भेजा था। यह मकबरा विशाल गुम्बद के साथ संगमरमर का बना है। इसके निर्माण के बारे में कहा जाता है कि 1405ई. इसे स्वयं होशंगशाह ने बनवाया था। यह विशाल मकबरा दो भागों में विभक्त है। इसका पश्चिमी भाग धर्मशाला के नाम से जाना जाता है। इसमें स्तम्भों पर त्रिशूल, हाथी की सूंड सहित अनेक आकृतियां उभरी नजर आती है। मध्ययुगीन भारतीय स्मारकों में यह मकबरा अपनी विशालता और विशिष्ठता लिये प्रसिद्ध है।
जामी मस्जिद:- यह एक विशाल और महत्वपूर्ण स्थापत्य की इमारत है। इस मस्जिद का निर्माण दमिश्क की प्रख्यात मस्जिद के अनुरूप कराया गया था। इसका निर्माण होशंगशाह ने आरम्भ कराया और महमूद खिलजी ने 1454ई. में पूरा करवाया। इस मस्जिद के प्रभावोत्पादक गुम्बद, प्रशस्त प्रार्थना मण्डप, विशाल प्रांगण सादी किन्तु सुन्दर स्थापत्य कला, व्यापक योजना को देखते हुए माण्डू की स्थापत्य शैलियों में अपना विशिष्ठ महत्व रखती है। ऐसा भी माना जाता है कि यह मस्जिद भारत की विशाल मस्जिदों में से एक है।

संगमरमर में होशंगशाह का मकबरा
अशर्फी महल:- यह महल जामी मस्जिद के ठीक सामने हैं जो किसी समय वहां के समस्त इतिहास में अत्यन्त रोचक एवं रंगीन रहा होगा। प्रसिद्ध कलात्मक फिल्म ‘किनारा’ की शूटिंग में इस महल की कलात्मकता व स्थापत्य को आधार बनाया गया था। यह पूरी फिल्म ही माण्डू के स्मारको में फिल्मायी गयी थी। मूल रूप से यह महल अध्यात्म शिक्षण का एक महाविद्यालय था और फिर यह एक कीर्ति स्तम्भ के साथ सम्बद्ध हुआ। इसका निर्माण महमूद खिलजी ने 1443ई. में मेवाड़ पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में कराया था। दस वर्ष बाद फिर मेवाड़ के महाराणा कुम्भा ने महमूद खिलजी को परास्त कर विजय स्मृति के फलस्वरूप चित्तौड़ में विजयस्तम्भ का निर्माण कराया। यह धारणा है कि महमूद का यह स्थल माण्डू की समस्त इमारतों में विशाल गुम्बद, संगमरमर के फर्श और शिल्पकला की दृष्टि से बहुत शानदार रहा होगा। सम्राट अकबर ने भी अशर्फी महल की मरम्मत करायी थी।
इस महल के नाम को लेकर ऐसी जनाश्रृति प्रसिद्ध है कि सम्राट जहांगीर अपनी बेगम नूरजहां के साथ माण्डू आया तो उसने नूरजहां से इसके स्तम्भ की सीढ़ियां चढ़ने को कहा। चूंकि चढ़ाई अधिक थी अतः नूरजहां ने इंकार कर दिया। तब जहांगीर ने प्रत्येक सीढ़ी चढ़ने पर नूरजहां को स्वर्णमुद्रा (अशर्फी) देने का लालच दिया तब नूरजहां सीढ़िया चढ़ती जाती और जहांगीर उन्हें अशर्फीयां देते जाते। बाद में वही अशर्फीयां गरीबों में बांट दी गयी तभी से इसे अशर्फी महल कहा जाने लगा।
बरसों बाद इसी महल की इस रोचक घटना को किनारा फिल्म में आधार बनाकर बड़ी खूबसूरती से दर्शाया गया जब नायक-चन्दन (धर्मेन्द्र) अन्धी नायिका आरती (हेमामालिनी) को इस महल की सीढ़ियां चढ़ने को कहता है परन्तु नायिका आंखों की रोशनी न होने से चढ़ने में असमर्थता बताती है। परन्तु जब नायक चन्दन जहांगीर की भांति उसे लालच देता है तब आरती नायक के सहारे से सीढ़िया चढ़ती है तब नायक सीढ़िया चढ़ती नायिका के पैरों के साथ-साथ सौ-सौ रूपयों के नोट रखता जाता है। फिल्म किनारा का यह मनमोहन दृश्य आज भी कला प्रेमियों को मंत्र मुग्ध कर देता है।
इतिहास समेटे अशर्फी महल
रूपमती महल/मण्डप:- मध्ययुगीन इतिहास की विख्यात प्रेमकथा के अमर नायक-नायिका बाज बहादुर और रानी रूपमती के अनेक महल, झरोखें इस क्षेत्र में है। बाज बहादुर और रूपमती का मण्डप महल पास-पास है। महल के मण्डप इसे खूबसूरती प्रदान करते है। यहां के ऊपरी भाग से आस-पास का प्राकृतिक सौन्दर्य देखते ही बनता है। शिखर पर रूपमती का झरोखा है जहां हवा तेज हो जाती है। शांत संध्या व चांदनीरात में दुर्ग के अन्तर्गत सर्वाधिक ऊंचाई पर बना यह बड़ा खूबसूरत महल है। किनारा फिल्म का सर्व प्रसिद्ध गीत कलाकार जितेन्द्र एवं हेमामालिनी पर कलात्मक रूप में ‘‘नाम गुम जायेगा चेहरा ये बदल जायेगा’’ यहीं पर बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया था।
बाज बहादुर का महल व रेवा कुण्ड:- यह महल लाल पाषाण खण्डों से निर्मित है जो स्थापत्य कला का सुन्दर उदाहरण है। यह रेवाकुण्ड के निकट है जो बाज बहादुर को काफी प्रिय था, क्योंकि उसकी प्रेमिका रूपमती रेवाकुण्ड आया करती थी। रेवा का अर्थ नर्मदा से है। रेवाकुण्ड का निर्माण रूपमती के प्रेम का ही प्रमाण था जिसमें नर्मदा नदी का जल, लाया गया था। इसी कुण्ड से बाज बहादुर के महल में पानी पहंुचाने की प्राचीन जल प्रणाली को आज भी देखा जा सकता है। रूपमती बगैर नर्मदा दर्शन के अन्न, जल ग्रहण नहीं करती थी। उसकी अपार श्रद्धा के कारण ही नर्मदा यहां कुण्ड में पानी के रूप में प्रकट हुयी थी।
दाई का महल:- यह एक खूबसूरत मकबरा है जो एक उच्च पीठ पर बना हुआ है। इसके रक्षक रूप में मेहराबदार द्वार वाले अनेक प्रकोष्ठ है। इसके उत्तर पूर्वी, दक्षिण पूर्वी कोणों पर वृत्ताकार स्तम्भों के सुन्दर अवशेष है। समीप की पहाड़ी पर जाली महल है जो किसी उमराव का सुन्दर मकबरा है। इसके हर तरफ तीन-तीन सुन्दर मेहराबदार द्वार है।
दाई का महल
नीलकण्ठ मंदिर और महल:- इसका निर्माण सम्राट अकबर ने अपने सूबेदार शाह बुदाख खां से कहकर करवाया था। मंदिर में एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। यहां 1600ई. का एक फारसी शिलालेख लगा है जिसमें एक रूबाई भी अंकित है। यहां का नीलकण्ठ महल भी रम्य है। यह गहरी घाटी में बना हुआ माण्डू का अत्यन्त प्रभावोत्पादक नैसर्गिक सौन्दर्य स्थल है। वर्षाकाल में यहां की शोभा दर्शनीय होती है।
माण्डू उत्सव:- प्रतिवर्ष नवम्बर माह में माण्डू में उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी भोपाल द्वारा ‘माण्डू उत्सव’ का तीन दिवसीय भव्य उत्सव मनाया जाता है। जिसमें देश-प्रदेश के उच्च स्तरीय कलाकारों द्वारा कला संगीत की प्रस्तुतियां दी जाती है।
माण्डू भारत का बेहतरीन ऐतिहासिक और पर्यटन महत्व का स्थान है। यहां के अन्य सुन्दर स्थलों में अनेक मनोहारी बाग-बगीचें, मकबरें, महल, मस्जिदे आज भी देखने लायक है, जिनका इतिहास और पर्यटन जगत में महत्व है। माण्डू की खास पहचान यहां की इमली, सीताफल और खिरनी से है। ये फल प्राचीन समय से ही प्रसिद्ध रहे है। माण्डू की इमली के बीज खुरासान से मंगाकर यहां बोये थे। यहां का सीताफल तथा खिरनी खास मिठास के लिये बड़ी प्रसिद्ध है जिसे हर पर्यटक अपने साथ ले जाना पसन्द करता है।
लेख-
ललित शर्मा
झालावाड़ (राज.)
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October 12, 2026