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गोवत्स द्वादशी: भारतीय जीवन-मूल्यों में गौ-वंश का स्थान

गोवत्स द्वादशी: भारतीय जीवन-मूल्यों में गौ-वंश का स्थान

भारतीय संस्कृति में गाय को माता कहा गया है और यह केवल भारतीयों की ही माता नहीं अपितु संपूर्ण विश्व की माता है, महाभारत में भी कहा गया है -

मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः ।
वृद्धिमाकाङ्क्षता नित्यं गावः कार्याः प्रदक्षिणाः ॥  - विस्तृत श्रीमहाभारत (षष्ठ खंड, अनुशासन पर्व दान धर्म उपपर्व, 69.7)

अर्थ:- गौएँ सम्पूर्ण प्राणियों की माता कहलाती हैं। वे सबको सुख देने वाली हैं। जो अपने अभ्युदय की इच्छा रखता हो उसे गौओं को सदा दाहिने करके चलना चाहिये ।

भविष्यपुराण उत्तरपर्व अध्याय 271 के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात अपने संबंधियों की मृत्यु से उद्विग्न हो रहे सम्राट युधिष्ठिर के प्रश्न करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यह गोवत्स द्वादशी व्रत और कथा का उपदेश किया था । यह व्रत कार्तिक शुक्ल द्वादशी (मतांतर से कृष्ण पक्ष) को किया जाता है। राजा उत्तानपाद ने इस व्रत का भूमि पर प्रचार किया और उनकी पत्नी सुनीति और सुरुचि ने इस व्रत को किया था । गोवत्स द्वादशी का वर्णन श्रीनारद पुराण में पूर्वभाग अध्याय 98 में भी मिलता है।

गोवत्स द्वादशी पर गौ-पूजन
गोवत्स द्वादशी पर गौ-पूजन

भगवान श्रीकृष्ण गायों से विशेष प्रेम करते थे और गायों को चराने ले जाते थे । उनके जन्म के अवसर पर नंदबाबा ने ब्राह्मणों को दो लाख गौएँ दान दी थी इन कथाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध पूर्वार्ध के पाँचवे, पंद्रहवें, बाईसवें एवं तेईसवें अध्याय, में मिलता है, ये अमृतमयी लीला कथाएं चित्त एवं अंतःकरण को शुद्ध कर मनुष्य बनाने वाली हैं ।

ईश्वर की उपासना के लिए किए जाने वाले यज्ञ गाय के बिना अधूरे हैं। जिस भूमि में यज्ञ होता है उसे गाय के गोबर से लीपकर पवित्र किया जाता है। गाय के दूध, दही और घी यज्ञ में प्रसाद एवं आहुति के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। यज्ञ से ही देवताओं को आहुतियाँ प्रदान करने से सब प्रकार से सुख - समृद्धि और राज्य की उन्नति होती है। भगवान श्रीकृष्ण भी श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है । वस्तुतः यह वाक्य अपने आप में स्वयंसिद्ध है कि जहाँ गौएँ प्रसन्न रहती हैं वहाँ वे मनुष्यों के सभी मनोरथों को पूर्ण करती है इसी से उसे ज्ञानियों द्वारा कामधेनु ऐसा भी कहा गया है। गौ और ईश्वर में कोई भेद नहीं है, सुंदर आभूषणों से युक्त बछड़े वाली गायों का दान सभी दानों में उत्तम बताया गया है, ऋग्वेद में भी गायों की उपासना की गई है।

यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं चित्कृणुथा सुप्रतीकम्
भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहद्वो वय उच्यते सभासु ।। - ऋग्वेद - 6.28.6

अर्थ :- हे गायो ! तुम हमें बलिष्ठ बनाओ. तुम दुबले एवं असुंदर को भी सुंदर शरीर वाला बनाओ। हे भद्रवचन वाली गायो ! हमारे घर को कल्याणमय बनाओ। यज्ञ सभाओं में तुम्हारे महान अन्न का वर्णन होता है।

गोपों और गौवंश के साथ श्रीकृष्ण
गौ  के साथ श्रीकृष्ण

श्रीगुरुड पुराण में वैतरणी नरक का वर्णन है जिसमें गए हुए व्यक्ति का तो एकमात्र गाय ही सहारा है । जहाँ जाने के बाद जीव को बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं दीखता और जिसने अपने जीवन काल में या उसके निमित्त से भी यदि गौ का दान किया गया है तो वह गाय ही उसे अपनी पूँछ पकड़ाकर उस वैतरणी नरक से अनायास ही बाहर निकाल देती है। गाय और बैल ही धर्म और पृथ्वी (प्रकृति) का रूप हैं जो समस्त मनुष्य समुदाय को प्रकृति का वर्धन करने की ही प्रेरणा देती है, श्रीमद्भागवत महापुराण में प्रथम स्कंध के सोलहवें अध्याय में राजा परीक्षित ने जब देखा कि अधर्म रूपी कलियुग गौ और बैल को प्रताड़ित कर रहा है तब उन्होंने धनुष धारण कर कलि को दण्ड देने का निश्चय किया वे दण्ड देना ही चाहते थे कि कलि उनकी शरण में आ गया और राजा परीक्षित ने गौ(प्रकृति) और बैल(धर्म) की रक्षा की।

बछड़े के अभाव में वृषोत्सर्ग नहीं हो सकता, वृषोत्सर्ग के अभाव में परलोक में जीव को सद्गति नहीं मिलती और गौवंश की वृद्धि भी नहीं हो सकती । गरूड़ पुराण के धर्मकांड (प्रेतकल्प) अध्याय 221 में  वृषोत्सर्ग के महत्व का वर्णन किया गया है ।

धर्मसत्वं वृषरूपेण जगदानन्ददायकः।।
अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।
गङ्गायामुनयोः पेयमन्तर्वेदि तृणं चर।।
धर्मराजस्य पुरतो वाच्यं मे सुकृतं वृष। - श्रीगरूड़ पुराण (धर्मकाण्ड, प्रेतकल्प - 221)

अर्थ :-  हे! धर्म आप इस वृषभ रूप में संसार को आनंद प्रदान करने वाले देव हैं। आप ही अष्टमूर्ति शिव के अधिष्ठान हैं । अतः मुझे शांति प्रदान करें। आप गङ्गा यमुना का जल पियें । अंतर्वेदी में घास चरें और हे वृष! धर्मराज के सामने मेरे पुण्यकर्म की चर्चा करें।

श्रीगरूड़ पुराण 
श्री गरूड़ पुराण 

भारत एक कृषि प्रधान राष्ट्र है जिसे गाय ने अपने दूध, गोमय और गोमूत्र से समृद्ध किया और गोवत्स ने सदैव इस राष्ट्र की वृद्धि को अपने श्रम से सींचा है । गाय और उसके बछड़े के बिना प्रगति और उन्नति एक कोरी कल्पना की तरह है।

गौवत्स बड़े होने पर बैल के रूप में खेतों में हल जोतने, बुआई करने, निंदाई-गुड़ाई और फसलों  को ढोने का कार्य करते थे । राजा महाराजाओं के पास तो आने जाने के लिए रथ, घोड़े आदि रहते थे किन्तु ग्रामीण परिवेश में रहने वाले लोगों और वनों, पर्वतों और अस्थायी रूप से एक स्थान पर निवास करने वाले लोगों के लिए बैल उनके लिए परिवहन के साधन के साथ - साथ, भार भी ढोते थे । श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के पञ्चम अध्याय में ही वर्णन मिलता है कि बैलों से जुते छकड़ों पर सवार होकर नंदबाबा पुनः मथुरा से गोकुल को लौट गए । अर्थव्यव्स्था में लेखांकन में भी गौवंश की गणना और लेख - जोखा जीवित स्कंध (पशुधन)के रूप में किया जाता है । रहट द्वारा कुएँ से पानी निकालने और सिंचाई के लिए भी बैलों का उपयोग किया जाता था।

भारतीय कृषि और ग्रामीण जीवन में गौवंश
भारतीय कृषि और ग्रामीण जीवन में गौवंश

पूर्वकाल में कृषि में गाय और बैलों के गोबर का खाद के रूप में प्रयोग किया जाता था जिससे न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन होता था किंतु आधुनिक कृषि यंत्रों ने न सिर्फ उनका स्थान छीना अपितु कृषकों की लागत में वृद्धि की, उनसे होने वाले शोर, धुएँ और कार्बन उत्सर्जन से प्रकृति को भयानक क्षति हो रही है। वर्तमान समय में बैलों का प्रयोग लगभग समाप्त हो जाने और आधुनिक युग में उत्तम शैली से युक्त जीवन जीने की चाह में गौपालन न करने के कारण ही आज विभिन्न स्थानों पर संचालित पशु हत्या गृहों एवं अवैध बूचड़खानों में गौ हत्या की जा रही है यह भारत के लोगों का बड़ा दुर्भाग्य है । यद्यपि विभिन्न प्रांतों की सरकार द्वारा गौ और गौवंश हत्या पर प्रतिबंध लगाकर कड़े कानून बनाए हैं तो भी गौ और गौवंश की हत्या लगातार बढ़ रही है। गाय और बछड़े न सिर्फ भारतीय संस्कृति और धर्म के वाहक के रूप में है अपितु वे ग्रामीण जीवन के भी परिचायक हैं क्योंकि भारत का जीवन ग्रामों में निवास करता है यह संस्कृति वर्तमान में विलुप्त होती जा रही है।

अंत में समस्त मनुष्य समुदाय से यही कहते हैं कि गौवंश के लगातार ह्रास को दृष्टिगत रखकर आज प्रत्येक घर में न्यूनतम एक गौपालन और उससे उत्पन्न पुत्र के बड़े होने पर उस गोवत्स का धर्मपूर्वक अपने या पूर्वजों के निमित्त वृषोत्सर्ग और कृषि या अन्य कार्यों में उपयोग और उनके संवर्धन की चेतना को प्रत्येक घर और जन - जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है ।


- विशाल प्रजापत

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