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वागड़ के स्थापत्य में नृत्य- गणपति

वागड़ के स्थापत्य में नृत्य- गणपति


प्राचीन काल से ही भारतीय ज्ञान परम्परा का क्षेत्र बहुत विस्तृत रहा है। शिक्षा में कलाओं की शिक्षा का अपना महत्त्व रहा है। शुक्राचार्य के अनुसार कलाओं के भिन्न भिन्न नाम नहीं होते है केवल उनके लक्षण अलग अलग होते है, क्योंकि क्रिया के पार्थक्य से ही कलाओं में भेद होता है। जैसे, हाव भाव आदि के साथ गति को नृत्य कहा जाता है। नृत्य कला में करण, अंगहार, विभाव, भाव एवं रसों की अभिव्यक्ति की जाती है। नृत्य दो प्रकार का माना गया है: नाट्य और अनाट्य। नृत्यकला प्राचीन काल से ही उन्नत अवस्था में रही है। वर्षा ऋतु में घन गर्जना के साथ मयूर का आनन्दित करने वाला नृत्य तन मन को प्रफुल्लित कर देता है।

राजस्थान के सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित बाँसवाड़ा अपनी ऐतिहासिक कला एवं प्राचीन संस्कृति के लिए जाना जाता है। पुराणों में पुष्प प्रदेश, गुप्त प्रदेश, पाताल प्रदेश आदि नामों से वर्णित इस क्षेत्र में अनेक भव्य एवं ऐतिहासिक देवालय और सुरम्य प्राकृतिक स्थल विद्यमान हैं। बाँसवाड़ा से 14 किमी दूर पश्चिम में बाँसवाड़ा डूंगरपुर मार्ग पर स्थित तलवाड़ा प्राचीन समय में स्थापत्य कला के क्षेत्र में अग्रणी रहा है।

गणेश मंदिर बांसवाड़ा
गणेश मंदिर बांसवाड़ा

इस क्षेत्र में शिल्प वैभव से पूरित अनेक प्राचीन देवालय हैं, जिनका निर्माण लगभग 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच हुआ है। तलवाड़ा सूर्य मन्दिर के सामने सिद्धि विनायक का मन्दिर निर्मित है, जिसमें श्रीगणेश की प्राचीन प्रतिमा अवशेष के रूप में संरक्षित है। देवालय का जीर्णोद्धार हो चुका है, लेकिन इसकी प्राचीन मूर्तियाँ आज भी संरक्षित हैं और रंग रोगन के साथ धरोहर के रूप में दृष्टव्य हैं। जनश्रुतियों के अनुसार गुजरात के सम्राट सिद्धराज ने परमार शासकों से लम्बे युद्ध में विजय प्राप्त करने के हर्ष में गणेश मन्दिर का निर्माण करवाया।

सनातन संस्कृति में श्रीगणेश को विभिन्न नामों और उनके प्रतिमा लक्षणों के आधार पर लम्बोदर, हेरम्ब, शूर्पकर्ण, शक्तिगणेश एवं नृत्य गणेश के रूप में प्रतिपादित किया गया है। शारदा तिलक एवं मेरुतन्त्र में गणेश के दस स्वरूपों का संकेत मिलता है। राव गोपीनाथ महाशय द्वारा सोलह गणेश प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है, जिनमें नृत्य गणेश भी शामिल हैं। तलवाड़ा के श्रीगणेश मन्दिर की भित्ति पर गणेश का नटेश स्वरूप, अर्थात नृत्य गणेश, उत्कीर्ण किया गया है। श्रीगणेश के द्वादश नामों के आधार पर देवालय की भित्ति पर द्वादश गणेश प्रतिमाओं का अंकन है। ये सभी नृत्य गणपति के रूप में दृष्टव्य हैं।


मंदिर मे स्थापित गणेश जी की मूर्ति 

नृत्य करते हुए गणपति की सभी प्रतिमाएँ पूर्ण रूप से श्रृंगारित एवं मनमोहक हैं। सभी प्रतिमाएँ द्विभुजी हैं और उनमें अर्धरेचित, रचित एवं कटि हस्त मुद्राएँ दृष्टव्य हैं। साहित्य के सन्दर्भ में देखा जाए तो मुद्रा वह है जो मन को परम आनन्द देती हो, मुदं आंन्दंग रति ददाति। कहा भी जाता है कि मुद्रा नृत्य की भाषा है। नृत्य में हस्त मुद्राएँ मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं। विवेच्य नृत्य गणपति की प्रतिमाओं में असंयुक्ता एवं संयुक्ता मुद्राओं को निरूपित किया गया है।


नृत्य गणेश

नटेश गणेश की प्रथम मुद्रा में गणेश को नृत्य की भंगिमा में पखावज पर थाप देते हुए उत्कीर्ण किया गया है। साथ में मूषकराज भी नृत्य करते प्रतीत हो रहे हैं। द्वितीय नृत्य प्रतिमा में गणपति झाँझ बजाते हुए नृत्य में लीन हैं। एक अन्य प्रतिमा में दायें कर में डमरू है और बायाँ कर लता हस्त की नृत्य भंगिमा में अंकित है। अन्य प्रतिमाओं में नाट्यशास्त्र में वर्णित अनेक मुद्राओं में श्रीगणेश का नृत्य कौशल दृष्टव्य है। स्थापत्य कला में होसलयेश्वर की नृत्य गणपति प्रतिमाएँ विशेष रूप से प्रख्यात हैं।

लेख
डॉ. अदिति गौड़
ज्योति कॉलोनी, केकड़ी

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